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कोलाहल के आँगन!
आज मैं प्रसिद्ध हिन्दी कवि और गीतकार स्वर्गीय हरीश भादानी जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| इनकी रचनाएं मैंने शायद पहले शेयर नहीं की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय हरीश भादानी जी की यह रचना – दिन ढलते-ढलतेकोलाहल के आंगनसन्नाटारख गई हवा दिन ढलते-ढलते दो छते कंगूरे परदूध का कटोरा थाधुंधवाती चिमनी मेंउलटा…