आज मैं प्रसिद्ध हिन्दी कवि और गीतकार स्वर्गीय हरीश भादानी जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ|
इनकी रचनाएं मैंने शायद पहले शेयर नहीं की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय हरीश भादानी जी की यह रचना –

दिन ढलते-ढलते
कोलाहल के आंगन
सन्नाटा
रख गई हवा
दिन ढलते-ढलते
दो छते कंगूरे पर
दूध का कटोरा था
धुंधवाती चिमनी में
उलटा गई हवा
दिन ढलते-ढलते
घर लौटे
लोहे से बतियाते
प्रश्नों के कारीगर
आतुरती ड्योढ़ी पर
सांकल जड़ गई हवा
दिन ढलते-ढलते
कुंदनिया दुनिया से
झीलती हक़ीक़त की
बड़ी-बड़ी आंखों को
अंसुवा गई हवा
दिन ढलते-ढलते
हरफ़ सब रसोई में
भीड़ किए ताप रहे
क्षण के क्षण चूल्हे में
अगिया गई हवा
दिन ढलते-ढलते
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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