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पीना मुश्किल है!
इक सब्र के घूँट से मिट जाती तब तिश्ना-लबों की तिश्ना-लबी, कम-ज़र्फी-ए-दुनिया के सदक़े ये घूँट भी पीना मुश्किल है| अर्श मलसियानी
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सीना मुश्किल है!
जब नाख़ुन-ए-वहशत चलते थे रोके से किसी के रुक न सके, अब चाक-ए-दिल-ए-इन्सानिय्यत सीते हैं तो सीना मुश्किल है| अर्श मलसियानी
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दौर में जीना मुश्किल है
ये दौर-ए-ख़िरद है दौर-ए-जुनूँ इस दौर में जीना मुश्किल है, अँगूर की मय के धोके में ज़हराब का पीना मुश्किल है| अर्श मलसियानी
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असिधारा-पथ!
आज मैं राष्ट्रप्रेम की कविताएं लिखने वाले प्राचीन कवि पद्म भूषण स्वर्गीय बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ जी की एक कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ| उनकी कुछ कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है पद्म भूषण स्वर्गीय बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ जी की यह कविता – ओ असिधारा-पथ के गामी!विकट सुभट तुम, अथक पथिक…
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रस्म-ए-उल्फ़त देखिए
थी ख़ता उनकी मगर जब आ गए वो सामने, झुक गईं मेरी ही आँखें रस्म-ए-उल्फ़त देखिए| जोश मलीहाबादी
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वाह क्या अशआर हैं
रश्हा-ए-शबनम बहार-ए-गुल फ़रोग़-ए-मेहर-ओ-माह, वाह क्या अशआर हैं दीवान-ए-फ़ितरत देखिए| जोश मलीहाबादी
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एक चश्मा हुस्न का!
फूट निकलेगा जबीं से एक चश्मा हुस्न का, सुब्ह उठ कर ख़ंदा-ए-सामान-ए-क़ुदरत देखिए| जोश मलीहाबादी