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सब जाने-पहचाने थे!
रात के ख़्वाब सुनाएँ किस को रात के ख़्वाब सुहाने थे, धुँदले धुँदले चेहरे थे पर सब जाने-पहचाने थे| इब्न-ए-इंशा
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सुब्ह सहर से पहले!
चाँद से आँख मिली जी का उजाला जागा, हमको सौ बार हुई सुब्ह सहर से पहले| इब्न-ए-इंशा
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तिरे दर से पहले!
हम किसी दर पे न ठिटके न कहीं दस्तक दी, सैकड़ों दर थे मिरी जाँ तिरे दर से पहले| इब्न-ए-इंशा
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रात ढलती ही नहीं!
जी बहलता ही नहीं अब कोई साअ‘त कोई पल, रात ढलती ही नहीं चार पहर से पहले| इब्न-ए-इंशा
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हिज्र का ग़म भी देखा!
इश्क़ पहले भी किया हिज्र का ग़म भी देखा, इतने तड़पे हैं न घबराए न तरसे पहले| इब्न-ए-इंशा
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चल दिए उठ के!
चल दिए उठ के सू-ए-शहर-ए-वफ़ा कू-ए-हबीब, पूछ लेना था किसी ख़ाक-बसर* से पहले| *शोकमग्न इब्न-ए-इंशा
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इश्क़ में घर से पहले!
अपने हमराह जो आते हो इधर से पहले, दश्त पड़ता है मियाँ इश्क़ में घर से पहले| इब्न-ए-इंशा
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अतिथि से!
आज मैं छायावाद युग की एक प्रमुख कवियित्री स्वर्गीय महादेवी वर्मा जी की एक कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ| महादेवी जी की कुछ कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय महादेवी वर्मा जी की यह कविता – बनबाला के गीतों सानिर्जन में बिखरा है मधुमास,इन कुंजों में खोज रहा हैसूना…
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कोई सितारा नहीं!
बना सकूँ जिसे झूमर तुम्हारे माथे का, फ़लक पे आज भी ऐसा कोई सितारा नहीं| क़तील शिफ़ाई
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हसरत-ए-नज़ारा नहीं!
जो तेरी दीद ने बख़्शे वही हैं ज़ख़्म बहुत, अब अपने दिल में कोई हसरत-ए-नज़ारा नहीं| क़तील शिफ़ाई