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क्या भाया!
आज एक बार मैं अपने समय के श्रेष्ठ कवि, संपादक और नाटक लेखक स्वर्गीय नेमिचन्द्र जैन जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| आप अज्ञेय जी द्वारा संपादित ‘तारसप्तक’ के भी एक महत्वपूर्ण कवि थे| इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय नेमिचन्द्र जैन जी की यह…
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वो गुदगुदाना याद है!
शौक़ में मेहंदी के वो बे-दस्त-ओ-पा होना तिरा, और मिरा वो छेड़ना वो गुदगुदाना याद है| हसरत मोहानी
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वो ठिकाना याद है!
चोरी चोरी हम से तुम आ कर मिले थे जिस जगह, मुद्दतें गुज़रीं पर अब तक वो ठिकाना याद है| हसरत मोहानी
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ख़ुद रूठ जाना याद है!
देखना मुझ को जो बरगश्ता तो सौ सौ नाज़ से, जब मना लेना तो फिर ख़ुद रूठ जाना याद है| हसरत मोहानी