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नीम-निगाही का चलन
इश्क़ में आज भी है नीम-निगाही* का चलन, प्यार करते हैं उसी हुस्न-ए-रिवायात से हम| *निगाह चुराकर देखना जाँ निसार अख़्तर
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तेरी मुलाक़ात से हम!
आज तो मिल के भी जैसे न मिले हों तुझ से, चौंक उठते थे कभी तेरी मुलाक़ात से हम| जाँ निसार अख़्तर
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अकाल-धन!
आज एक बार फिर से मैं हिन्दी साहित्य की सभी विधाओं में अपनी अमिट छाप छोड़ने वाले प्रसिद्ध व्यक्तित्व स्वर्गीय सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय जी की एक कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ| अज्ञेय जी की कुछ रचनाएँ मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है अज्ञेय जी की यह कविता – घन अकाल…
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इतने मजबूर रहे हैं!
दिल को हर लम्हा बचाते रहे जज़्बात से हम, इतने मजबूर रहे हैं कभी हालात से हम| जाँ निसार अख़्तर
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हीरे कभी चुन लाए हैं!
संग-रेज़ों* से ख़ज़फ़-पारों** से, कितने हीरे कभी चुन लाए हैं| *पत्थर के टुकड़े, **ठीकरी के टुकड़े जाँ निसार अख़्तर
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बनेंगी साँपिन!
आज एक बार फिर से मैं प्रसिद्ध गीतकार स्वर्गीय कुँवर बेचैन जी का एक नवगीत प्रस्तुत कर रहा हूँ| बेचैन जी मेरे लिए अग्रज और गुरुतुल्य थे, बेचैन जी की बहुत सी रचनाएँ तथा उनके बारे में अपने अनुभव मैंने पहले भी शेयर किए हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय डॉक्टर कुँवर बेचैन जी का…