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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 1st Jan 2024

    चिड़ियों की तरह!

    उड़ के इक रोज़ बहुत दूर चली जाती हैं, घर की शाख़ों पे ये चिड़ियों की तरह होती हैं|              मुनव्वर राना

  • 1st Jan 2024

    घर में रहते हुए!

    घर में रहते हुए ग़ैरों की तरह होती हैं, लड़कियाँ धान के पौदों की तरह होती हैं|              मुनव्वर राना

  • 1st Jan 2024

    नववर्ष 2024!

    अनेक समस्याओं से जूझते हुए, दुनिया के बहुत से क्षेत्रों में युद्ध के माहौल में यह साल गुज़र गया और अब कोरोना के मामले फिर से डराने लगे हैं| आखिर आ ही गया नया साल! एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट को संशोधित रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ| नववर्ष का शिशु, धरती पर अपने नन्हे पांव…

  • 31st Dec 2023

    तुम आ गए तो वक़्त!

    वर्ना वही उजाड़ हवेली सी ज़िंदगी, तुम आ गए तो वक़्त ठिकाने से कट गया|               मुनव्वर राना

  • 31st Dec 2023

    ये पेड़ सिर्फ़ बीच में!

    उस पेड़ से किसी को शिकायत न थी मगर, ये पेड़ सिर्फ़ बीच में आने से कट गया|             मुनव्वर राना 

  • 31st Dec 2023

    कुछ मैल तो बदन का!

    ऐ आँसुओ तुम्हारी ज़रूरत है अब मुझे, कुछ मैल तो बदन का नहाने से कट गया|              मुनव्वर राना

  • 31st Dec 2023

    घराने से कट गया!

    जोड़े की शान बढ़ गई महफ़िल महक उठी, लेकिन ये फूल अपने घराने से कट गया|             मुनव्वर राना

  • 31st Dec 2023

    मैं आज अपने!

    माँ आज मुझ को छोड़ के गाँव चली गई, मैं आज अपने आईना-ख़ाने से कट गया|            

  • 31st Dec 2023

    ज़माने से कट गया!

    ये सर-बुलंद होते ही शाने से कट गया, मैं मोहतरम हुआ तो ज़माने से कट गया|             मुनव्वर राना

  • 31st Dec 2023

    अनाम!

    आज एक बार फिर मैं हिन्दी साहित्य की सभी विधाओं में अपना अमूल्य योगदान करने वाले तथा धर्मयुग पत्रिका के यशस्वी संपादक रहे स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ|  भारती जी की बहुत सी रचनाएँ मैं पहले भी शेयर कर चुका हूँ| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी…

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