अनेक समस्याओं से जूझते हुए, दुनिया के बहुत से क्षेत्रों में युद्ध के माहौल में यह साल गुज़र गया और अब कोरोना के मामले फिर से डराने लगे हैं| आखिर आ ही गया नया साल! एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट को संशोधित रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ|
नववर्ष का शिशु, धरती पर अपने नन्हे पांव रख चुका है, इसकी अगवानी कीजिए।
आज ज्ञान बघारने का समय नहीं है, यह सोचें कि क्या है जो पिछले वर्ष चाहकर भी नहीं हासिल कर पाए, और इरादा बनाएं वह उपलब्धि इस वर्ष प्राप्त करने की!
किसी कवि की पंक्तियां याद आ रही हैं-

आने वाले स्वागत
जाने वाले विदा,
अगले चौराहे पर-
इंतज़ार,
शुक्रिया।
और कुछ पंक्तियां किशन ‘सरोज’ जी की ऐसे ही याद आ रही हैं-
भावुकता के कैसे केश संवारे जाएं,
कैसे इन घड़ियों के चित्र उतारे जाएं,
लगता है मन की आकुलता का अर्थ यही,
आगत के आगे हम हाथ पसारे जाएं।
वैसे आकुलता की बात नहीं, उल्लास की बात है, लेकिन आगत के आगे तो हाथ पसारे जाना है।
अब साबिर दत्त जी की एक नज़्म याद आ रही है-
एक बिरहमन ने कहा है कि ये साल अच्छा है
ज़ुल्म की रात बहुत जल्द टलेगी अब तो
आग चूल्हों में हर इक रोज़ जलेगी अब तो
भूक के मारे कोई बच्चा नहीं रोएगा
चैन की नींद हर एक शख़्स यहाँ सोएगा
आँधी नफ़रत की चलेगी न कहीं अब के बरस
प्यार की फ़स्ल उगाएगी ज़मीं अब के बरस
है यक़ीं अब न कोई शोर-शराबा होगा
ज़ुल्म होगा न कहीं ख़ून-ख़राबा होगा
ओस और धूप के सदमे न सहेगा कोई
अब मिरे देश में बेघर न रहेगा कोई
नए वादों का जो डाला है वो जाल अच्छा है
रहनुमाओं ने कहा है कि ये साल अच्छा है
दिल के ख़ुश रखने को ग़ालिब ये ख़याल अच्छा है
बस यही कामना है कि नए साल में ऐसी परिस्थितियाँ न रहें, जैसी पिछले कुछ वर्षों में रहीं और जल्दी ही हम सब एक स्वस्थ और समृद्धिपूर्ण परिवेश में जी सकें और फिर से नकाब (मॉस्क ) पहनने की नौबत न आए|
नए वर्ष में हम स्नेह और स्वाभिमान दोनों को साथ लेकर आगे बढें।
सभी सुखी हों। सभी का कल्याण हो। इन भावनाओं के साथ, पुनः
नववर्ष की मंगल कामनाएं।
नमस्कार।
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