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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 4th Jan 2024

    इक ख़ौफ़ सा गुज़रा है!

    एक सन्नाटा दबे-पाँव गया हो जैसे, दिल से इक ख़ौफ़ सा गुज़रा है बिछड़ जाने का|                गुलज़ार

  • 4th Jan 2024

    मिरे अफ़्साने का!

    ज़िक्र होता है जहाँ भी मिरे अफ़्साने का, एक दरवाज़ा सा खुलता है कुतुब-ख़ाने* का| *Research Library               गुलज़ार 

  • 4th Jan 2024

    मोआमला तो रहा!

    ये और बात कि हर छेड़ ला-उबाली थी, तिरी नज़र का दिलों से मोआमला तो रहा|                   जाँ निसार अख़्तर 

  • 4th Jan 2024

    शब्दों की पुकार!

    आज एक बार फिर मैं हिन्दी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय दुष्यंत कुमार जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| दुष्यंत जी को आपातकाल में लिखी गई उनकी ग़ज़लों के संग्रह ‘साये में धूप’ के लिए विशेष रूप से खयाती मिली थी| दुष्यंत जी की बहुत सी रचनाएँ मैं पहले भी शेयर कर चुका हूँ|…

  • 3rd Jan 2024

    फ़ासला तो रहा!

    मैं तेरी ज़ात में गुम हो सका न तू मुझ में, बहुत क़रीब थे हम फिर भी फ़ासला तो रहा|              जाँ निसार अख़्तर 

  • 3rd Jan 2024

    न अक़्ल हार सकी!

    चलो न इश्क़ ही जीता न अक़्ल हार सकी, तमाम वक़्त मज़े का मुक़ाबला तो रहा|              जाँ निसार अख़्तर

  • 3rd Jan 2024

    क़दम क़दम पे कोई!

    गुज़र ही आए किसी तरह तेरे दीवाने, क़दम क़दम पे कोई सख़्त मरहला तो रहा|               जाँ निसार अख़्तर

  • 3rd Jan 2024

    हौसला तो रहा!

    तमाम उम्र अज़ाबों का सिलसिला तो रहा, ये कम नहीं हमें जीने का हौसला तो रहा|            जाँ निसार अख़्तर

  • 3rd Jan 2024

    दिल में अपने दर्द की!

    दिल में अपने दर्द की छिटकी हुई है चाँदनी, हर तरफ़ फैली हुई है तीरगी ये मत कहो|             जाँ निसार अख़्तर

  • 3rd Jan 2024

    उनके वादों में हुई है!

    जितने वादे कल थे उतने आज भी मौजूद हैं, उनके वादों में हुई है कुछ कमी ये मत कहो|              जाँ निसार अख़्तर 

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