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कोई रास्ता तो दे!
मैं ख़ुद ही खो गया तुझे पाने की फ़िक्र में, अब ऐ ग़म-ए-हयात कोई रास्ता तो दे| राना सहरी
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क्या है बता तो दे!
बे-शक मिरे नसीब पे रख अपना इख़्तियार, लेकिन मिरे नसीब में क्या है बता तो दे| राना सहरी
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अपना पता तो दे!
बरसों मैं तेरे नाम पे खाता रहा फ़रेब, मेरे ख़ुदा कहाँ है तू अपना पता तो दे| राना सहरी
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इच्छा-शक्ति!
आज एक बार फिर से मैं प्रसिद्ध हास्य-व्यंग्य कवि और कुशल मंच संचालक श्री अशोक चक्रधर जी की एक कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ| चक्रधर जी की कुछ रचनाएँ मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अशोक चक्रधर जी की यह कविता – ओ ठोकर !तू सोच रहीमैं बैठ जाऊंगीरोकर,भ्रम है तेराचल…
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कोई फ़ैसला तो दे!
मैंने ये कब कहा कि मिरे हक़ में हो जवाब, लेकिन ख़ामोश क्यों है कोई फ़ैसला तो दे| राना सहरी
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कैसी मसीहाई है!
कैसे हमदर्द हो तुम कैसी मसीहाई है, दिल पे नश्तर भी लगाते हो तो मरहम की तरह| राना सहरी
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शबनम की तरह!
मैंने ख़ुशबू की तरह तुझको किया है महसूस, दिल ने छेड़ा है तिरी याद को शबनम की तरह| राना सहरी
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मोहर्रम की तरह!
मेरे महबूब मिरे प्यार को इल्ज़ाम न दे, हिज्र में ईद मनाई है मोहर्रम की तरह| राना सहरी
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कभी ग़ुंचा कभी शोला!
कभी ग़ुंचा कभी शोला कभी शबनम की तरह, लोग मिलते हैं बदलते हुए मौसम की तरह| राना सहरी