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बहुत जानी हुई सूरत!
मिरी चश्म-ए-तन-आसाँ को बसीरत मिल गई जब से, बहुत जानी हुई सूरत भी पहचानी नहीं जाती| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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आग बहती है यहाँ!
अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से मैं अपने स्वर में नीरज जी की हिंदी ग़ज़ल के दो शेर और प्रस्तुत कर रहा हूँ जिनमें इंसानियत का संदेश दिया गया है- आग बहती है यहाँ गंगा में, झेलम में भी! आशा है आपको यह पसंद आएगा,धन्यवाद । ******
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ठुमुक चलत रामचंद्र!
अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से मैं अपने स्वर में गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा श्रीरामचरित मानस में बालक श्रीराम जी द्वारा पैदल चलना प्रारंभ करने से संबंधित प्रसिद्ध भजन प्रस्तुत कर रहा हूँ- ठुमुक चलत रामचंद्र बाजत पैजनिया! आशा है आपको यह पसंद आएगा, धन्यवाद । *******
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मेरा कवि ऐसे लोगों का!
आज एक बार फिर मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय मुकुट बिहारी सरोज जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ। सरोज जी की अधिक रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय मुकुट बिहारी सरोज जी का यह गीत– मेरा कवि ऐसे लोगों का साथ नहीं देगा कभीजिनके हाथ किया करते…
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हैरानी नहीं जाती!
कई बार इस की ख़ातिर ज़र्रे ज़र्रे का जिगर चेरा, मगर ये चश्म-ए-हैराँ जिस की हैरानी नहीं जाती| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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कई बार इसका दामन
कई बार इस का दामन भर दिया हुस्न-ए-दो-आलम से, मगर दिल है कि इस की ख़ाना-वीरानी नहीं जाती| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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लो सुनी गई हमारी!
लो सुनी गई हमारी यूँ फिरे हैं दिन कि फिर से,वही गोशा-ए-क़फ़स है वही फ़स्ल-ए-गुल का मातम| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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ये अजब क़यामतें हैं!
ये अजब क़यामतें हैं तिरे रहगुज़र में गुज़राँ,न हुआ कि मर मिटें हम न हुआ कि जी उठें हम| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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अब तो मज़हब कोई!
अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से मैं अपने स्वर में नीरज जी की एक ग़ज़ल के दो शेर प्रस्तुत कर रहा हूँ- अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए! आशा है आपको पसंद आएंगेधन्यवाद । *****
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तिरे गेसुओं की शबनम!
तिरी दीद से सिवा है तिरे शौक़ में बहाराँ,वो चमन जहाँ गिरी है तिरे गेसुओं की शबनम| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़