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फूल बे-शुमार दिखे!
ख़फ़ा थी शाख़ से शायद कि जब हवा गुज़री, ज़मीं पे गिरते हुए फूल बे-शुमार दिखे| गुलज़ार
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सहर होने को भी हम!
‘फ़िराक़’ इस गर्दिश-ए-अय्याम से कब काम निकला है, सहर होने को भी हम रात कट जाना समझते हैं| फ़िराक़ गोरखपुरी
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न हम दरिया समझते हैं
ये हस्ती नीस्ती सब मौज-ख़ेज़ी है मोहब्बत की, न हम क़तरा समझते हैं न हम दरिया समझते हैं| फ़िराक़ गोरखपुरी
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रौंदते जाते हैं काँटों को
ये कह कर आबला-पा रौंदते जाते हैं काँटों को, जिसे तलवों में कर लें जज़्ब उसे सहरा समझते हैं| फ़िराक़ गोरखपुरी
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तुझे अपना समझते हैं!
भुला दीं एक मुद्दत की जफ़ाएँ उसने ये कह कर, तुझे अपना समझते थे तुझे अपना समझते हैं| फ़िराक़ गोरखपुरी
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लोग तेरी सादगी को!
न शोख़ी शोख़ है इतनी न पुरकार इतनी पुरकारी, न जाने लोग तेरी सादगी को क्या समझते हैं| फ़िराक़ गोरखपुरी
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होश आया मोहब्बत में!
हमारा ज़िक्र क्या हमको तो होश आया मोहब्बत में, मगर हम क़ैस का दीवाना हो जाना समझते हैं| फ़िराक़ गोरखपुरी
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तेरी आवाज़!
आज मैं हिन्दी नवगीत के एक प्रमुख हस्ताक्षर स्वर्गीय ओम प्रभाकर जी का एक नवगीत प्रस्तुत कर रहा हूँ| उनकी कुछ रचनाएँ मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय ओम प्रभाकर जी की यह रचना – कितनी ख़ुशलफ़्ज़ थी तेरी आवाज़अब सुनाए कोई वही आवाज़। ढूँढ़ता हूँ मैं आज भी…