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टूट के याद आई है!
याद आई है तो फिर टूट के याद आई है, कोई गुज़री हुई मंज़िल कोई भूली हुई दोस्त| अहमद फ़राज़
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नज़र खा गई दोस्त!
तेरे क़ामत से भी लिपटी है अमर-बेल कोई, मेरी चाहत को भी दुनिया की नज़र खा गई दोस्त| अहमद फ़राज़
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ऐ अजनबी दोस्त!
तुझ से मिल कर तो ये लगता है कि ऐ अजनबी दोस्त, तू मिरी पहली मोहब्बत थी मिरी आख़िरी दोस्त|
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इश्क़ की आबरू!
सर-ए-मक़्तल-ए-शब-ए-आरज़ू रहे कुछ तो इश्क़ की आबरू, जो नहीं अदू तो ‘फ़राज़’ तू कि नसीब-ए-दार कोई तो हो| अहमद फ़राज़
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ये सुकून-ए-जाँ !
ये सुकून-ए-जाँ की घड़ी ढले तो चराग़-ए-दिल ही न बुझ चले, वो बला से हो ग़म-ए-इश्क़ या ग़म-ए-रोज़गार कोई तो हो| अहमद फ़राज़
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उजाड़ सी रह-गुज़र!
ये उदास उदास से बाम ओ दर ये उजाड़ उजाड़ सी रह-गुज़र, चलो हम नहीं न सही मगर सर-ए-कू-ए-यार कोई तो हो| अहमद फ़राज़
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उषा!
आज मैं प्रसिद्ध कवि स्वर्गीय शमशेर बहादुर सिंह जी की एक कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ, जिनको कवियों का कवि कहा जाता है| शमशेर जी की अधिक रचनाएँ मैंने पहले शेयर नहीं की हैं| आज की इस कविता में भोर में सूर्योदय के समय का चित्रण किया गया है| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शमशेर…
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मान लें कि चमन खिले!
कहीं तार-ए-दामन-ए-गुल मिले तो ये मान लें कि चमन खिले, कि निशान फ़स्ल-ए-बहार का सर-ए-शाख़-सार कोई तो हो| अहमद फ़राज़
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ए’तिबार कोई तो हो!
किसे ज़िंदगी है अज़ीज़ अब किसे आरज़ू-ए-शब-ए-तरब, मगर ऐ निगार-ए-वफ़ा तलब तिरा ए’तिबार कोई तो हो| अहमद फ़राज़