-
उस दर पे तिरा सर!
जिस दर से नदामत के सिवा कुछ नहीं मिलता, उस दर पे तिरा सर भी जो ख़म है तो मुझे क्या| क़तील शिफ़ाई
-
मुझे क़तरा भी मिला हो
हाँ ले ले क़सम गर मुझे क़तरा भी मिला हो, तू शाकी-ए-अर्बाब-ए-करम है तो मुझे क्या| क़तील शिफ़ाई
-
चांद हो गए मुंतशिर!
आज फिल्मी गीत और पटकथा लेखक श्री मनोज मुंतशिर के बहाने कुछ बात करने का मन हो रहा है| पिछले दिनों फिल्म ‘आदिपुरुष’ की पटकथा में आए कुछ संवादों के कारण मुंतशिर की काफी बदनामी हुई थी| पिछले एक-दो वर्षों में श्री मुंतशिर ने काफी ख्याति अर्जित की है, इसकी शुरुआत हुई थी फिल्म ‘केसरी’…
-
क्या मैंने कहा था कि!
क्या मैंने कहा था कि ज़माने से भला कर, अब तू भी सज़ावार-ए-सितम है तो मुझे क्या| क़तील शिफ़ाई
-
तुझे ग़म है तो मुझे क्या!
ऐ दोस्त! तिरी आँख जो नम है तो मुझे क्या, मैं ख़ूब हँसूँगा तुझे ग़म है तो मुझे क्या| क़तील शिफ़ाई
-
फ़क़त आपकी दोस्त!
मैं उसे अहद-शिकन कैसे समझ लूँ जिसने, आख़िरी ख़त में ये लिक्खा था फ़क़त आपकी दोस्त| अहमद फ़राज़
-
कहाँ आ गई दोस्त!
बारिश-ए-संग का मौसम है मिरे शहर में तो, तू ये शीशे सा बदन ले के कहाँ आ गई दोस्त| अहमद फ़राज़
-
तेरे लहजे की थकन!
तेरे लहजे की थकन में तिरा दिल शामिल है, ऐसा लगता है जुदाई की घड़ी आ गई दोस्त| अहमद फ़राज़
-
एहसान तुम्हारा लेकिन!
अब भी आए हो तो एहसान तुम्हारा लेकिन, वो क़यामत जो गुज़रनी थी गुज़र भी गई दोस्त| अहमद फ़राज़
-
आदमी लाचार है!
आज मैं श्रेष्ठ हिन्दी कवि और ग़ज़ल लेखक स्वर्गीय शेरजंग गर्ग जी की एक ग़ज़ल प्रस्तुत कर रहा हूँ| उनकी कुछ रचनाएँ मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शेरजंग गर्ग जी की यह ग़ज़ल – आदमी हर तरह लाचार है प्यारे भाईऔर क्या ख़ाक समाचार है प्यारे भाई गुंडई…