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मायूस तो नहीं हैं!
कुछ और बढ़ गए जो अँधेरे तो क्या हुआ, मायूस तो नहीं हैं तुलू-ए-सहर* से हम| *सूर्योदय साहिर लुधियानवी
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उदास तुम!
आज एक बार फिर से मैं साहित्य की सभी विधाओं में अपना अमूल्य योगदान करने वाले तथा धर्मयुग पत्रिका के यशस्वी संपादक रहे स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| भारती जी की कुछ कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी की…
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ज़माने के डर से हम!
भड़का रहे हैं आग लब-ए-नग़्मागर से हम, ख़ामोश क्या रहेंगे ज़माने के डर से हम| साहिर लुधियानवी
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आसमाँ हमारी तरफ़!
उछाल देते हैं पत्थर ख़ला में हम जो कभी, पलट के देखता है आसमाँ हमारी तरफ़| राजेश रेड्डी
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कमाँ हमारी तरफ़!
लगा के जान की बाज़ी जिसे बचाया था, खिंची हुई है उसी की कमाँ हमारी तरफ़| राजेश रेड्डी
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बस्तियाँ जला के मगर!
कहाँ कहाँ न छुपे बस्तियाँ जला के मगर, जहाँ जहाँ गए आया धुआँ हमारी तरफ़| राजेश रेड्डी
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दास्ताँ हमारी तरफ़!
इसी उमीद पे किरदार हम निभाते रहे, कि रुख़ करेगी कभी दास्ताँ हमारी तरफ़| राजेश रेड्डी
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ख़िज़ाँ हमारी तरफ़!
बिछड़ते वक़्त वो तक़्सीम कर गया मौसम, बहार उसकी तरफ़ है ख़िज़ाँ हमारी तरफ़| राजेश रेड्डी
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कुआँ हमारी तरफ़!
खड़े हैं प्यासे अना के इसी भरोसे पर, कि चल के आएगा इक दिन कुआँ हमारी तरफ़| राजेश रेड्डी
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न जाँ हमारी तरफ़!
न जिस्म साथ हमारे न जाँ हमारी तरफ़, है कुछ भी हम में हमारा कहाँ हमारी तरफ़| राजेश रेड्डी