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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 31st Jan 2024

    बिखरता हुआ सा कुछ!

    साहिल की गीली रेत पर बच्चों के खेल सा, हर लम्हा मुझ में बनता बिखरता हुआ सा कुछ|                निदा फ़ाज़ली

  • 31st Jan 2024

    रास्ता खुलता नहीं कहीं

    होता है यूँ भी रास्ता खुलता नहीं कहीं, जंगल सा फैल जाता है खोया हुआ सा कुछ|                निदा फ़ाज़ली

  • 31st Jan 2024

    भारतीय संगीत अनुभव संग्रहालय!

    मैंने अपनी भ्रमण से संबंधित पोस्ट्स में अन्य स्थानों के अलावा कुछ संग्रहालयों को भी कवर किया है| अधिकतर संग्रहालय हमारे अतीत के विवरणों की, राजा-महाराजाओं के शासन काल की जानकारी देते हैं, जिनमें ललित कलाओं, परंपराओं आदि की भी जानकारी मिलती है, लेकिन युद्धों और युद्ध के हथियारों और विभिन्न सिक्कों आदि की जानकारी…

  • 30th Jan 2024

    उलझा हुआ सा कुछ!

    देखा हुआ सा कुछ है तो सोचा हुआ सा कुछ, हर वक़्त मेरे साथ है उलझा हुआ सा कुछ|              निदा फ़ाज़ली

  • 30th Jan 2024

    जिस्म घायल है मगर!

    थक के गिरता है हिरन सिर्फ़ शिकारी के लिए, जिस्म घायल है मगर आँखों में रम बाक़ी है|               निदा फ़ाज़ली

  • 30th Jan 2024

    जंग के फ़ैसले!

    जंग के फ़ैसले मैदाँ में कहाँ होते हैं, जब तलक हाफ़िज़े* बाक़ी हैं अलम बाक़ी है| *रक्षक              निदा फ़ाज़ली

  • 30th Jan 2024

    उसकी क़लम बाक़ी है!

    मैंने पूछा था सबब पेड़ के गिर जाने का, उठ के माली ने कहा उसकी क़लम बाक़ी है|               निदा फ़ाज़ली

  • 30th Jan 2024

    क़सम बाक़ी है!

    अब न वो छत है न वो ज़ीना न अंगूर की बेल, सिर्फ़ इक उसको भुलाने की क़सम बाक़ी है|               निदा फ़ाज़ली

  • 30th Jan 2024

    ये ग़म बाक़ी है!

    उसको खो देने का एहसास तो कम बाक़ी है, जो हुआ वो न हुआ होता ये ग़म बाक़ी है|              निदा फ़ाज़ली

  • 30th Jan 2024

    खाली समय में! 

    आज एक बार फिर से मैं हिन्दी के श्रेष्ठ कवि और समाचार पत्रिका ‘दिनमान’  के संपादन से जुड़े रहे स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| सर्वेश्वर जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी की यह कविता…

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