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लिपटी परछाइयाँ!
आज मैं अज्ञेय जी द्वारा संपादित ‘तीसरा सप्तक’ एक महत्वपूर्ण कवि स्वर्गीय कुँवर नारायण जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| कुँवर नारायण जी की रचनाएं मैंने शायद पहले शेयर नहीं की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कुँवर नारायण जी की यह कविता – उन परछाइयों को,जो अभी अभी चाँद की रसवंत गागर…
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हम-कलाम कब से है!
कहाँ गए शब-ए-फ़ुर्क़त के जागने वाले, सितारा-ए-सहरी हम-कलाम कब से है| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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तेरे रंग-ए-लब से है!
अगर शरर है तो भड़के जो फूल है तो खिले, तरह तरह की तलब तेरे रंग-ए-लब से है| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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बड़े अदब से है!
हुआ है जब से दिल-ए-ना-सुबूर बे-क़ाबू, कलाम तुझ से नज़र को बड़े अदब से है| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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किसी का दर्द हो!
किसी का दर्द हो करते हैं तेरे नाम रक़म, गिला है जो भी किसी से तिरे सबब से है| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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न दिन को शब से है!
तिरी उमीद तिरा इंतिज़ार जब से है, न शब को दिन से शिकायत न दिन को शब से है| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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बादल घिरते देखा है!
आज मैं जनकवि बाबा नागार्जुन जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| बाबा नागार्जुन जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय बाबा नागार्जुन जी का यह नवगीत – अमल धवल गिरि के शिखरों पर,बादल को घिरते देखा है।छोटे-छोटे मोती जैसेउसके शीतल तुहिन कणों को,मानसरोवर के उन…
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हुनर में आ गया हूँ!
छुपा न पाया कभी ख़ुद को अपने शे‘रों में, मैं जो हूँ जैसा हूँ अपने हुनर में आ गया हूँ| राजेश रेड्डी
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भँवर में आ गया हूँ!
ये सोचकर कि न दूँ नाख़ुदा को ये ज़हमत, उतर के कश्ती से ख़ुद ही भँवर में आ गया हूँ| राजेश रेड्डी
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तिरे हाथ की लकीरों में
न आ सका मैं तिरे हाथ की लकीरों में, यही बहुत है तिरी चश्म-ए-तर में आ गया हूँ| राजेश रेड्डी