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तिरा दीदार करूँ!
तू क़रीब आए तो क़ुर्बत का यूँ इज़हार करूँ, आइना सामने रख कर तिरा दीदार करूँ| निदा फ़ाज़ली
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मेरे लिए जगह करो!
मेरी नशिस्त पे भी कल आएगा कोई दूसरा, तुम भी बना के रास्ता मेरे लिए जगह करो| निदा फ़ाज़ली
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न कहे सुना करो!
दिल में जिसे बसाओ तुम चाँद उसे बनाओ तुम, वो जो कहे पढ़ा करो जो न कहे सुना करो| निदा फ़ाज़ली
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देखो ये शहर है अजब
देखो ये शहर है अजब दिल भी नहीं है कम ग़ज़ब, शाम को घर जो आऊँ मैं थोड़ा सा सज लिया करो| निदा फ़ाज़ली
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उसके लिए दुआ करो!
शोहरत भी उसके साथ है दौलत भी उसके हाथ है, ख़ुद से भी वो मिले कभी उसके लिए दुआ करो| निदा फ़ाज़ली
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हिमाद्रि तुंग शृंग से!
श्रेष्ठ कवियों की कविताएं शेयर करने के क्रम में एक बार फिर से मैं छायावाद युग के एक प्रमुख स्तंभ स्वर्गीय जयशंकर प्रसाद जी की कविता शेयर कर रहा हूँ| प्रसाद जी को प्रकृति, देशभक्ति और ओज के सशक्त कवि के रूप में जाना जाता है| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय जयशंकर प्रसाद जी की…
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घर में ख़ुदा ख़ुदा करो!
अच्छी नहीं ये ख़ामुशी शिकवा करो गिला करो, यूँ भी न कर सको तो फिर घर में ख़ुदा ख़ुदा करो| निदा फ़ाज़ली
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आग छुपा दी जाए!
हमसे पूछो कि ग़ज़ल क्या है ग़ज़ल का फ़न क्या, चंद लफ़्ज़ों में कोई आग छुपा दी जाए| जाँ निसार अख़्तर
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जाड़े की गुलाबी रातें!
कम नहीं नश्शे में जाड़े की गुलाबी रातें, और अगर तेरी जवानी भी मिला दी जाए| जाँ निसार अख़्तर
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क्यूँ न खिलते हुए!
इन्हीं गुल-रंग दरीचों से सहर झाँकेगी, क्यूँ न खिलते हुए ज़ख़्मों को दुआ दी जाए| जाँ निसार अख़्तर