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आँचल का इक सिरा!
होंटों में ले के रात के आँचल का इक सिरा, आँखों पे रख के चाँद के होंटों का मस* जिए| *स्पर्श गुलज़ार
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गए सारे कारवाँ!
सहरा के उस तरफ़ से गए सारे कारवाँ, सुन सुन के हम तो सिर्फ़ सदा-ए-जरस* जिए| *घंटियों की आवाज़ गुलज़ार
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दो चार लम्हे बस में थे!
सदियों पे इख़्तियार नहीं था हमारा दोस्त, दो चार लम्हे बस में थे दो चार बस जिए| गुलज़ार
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हीरे कभी चुन लाए हैं!
संग-रेज़ों से ख़ज़फ़-पारों* से, कितने हीरे कभी चुन लाए हैं| *पत्थरों और ठीकरों जाँ निसार अख़्तर
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चैन!
आज एक बार फिर मैं अनेक सम्मान एवं पुरस्कारों से अलंकृत, अपने समय के प्रतिष्ठित कवि स्वर्गीय भारत भूषण अग्रवाल जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| स्वर्गीय अग्रवाल जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| आज प्रस्तुत है स्वर्गीय भारत भूषण अग्रवाल जी की यह कविता- ज़िंदगी को पकड़ूँया अपनी…