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नदिया का घना-घना कूल है!
आज मैं विख्यात हिन्दी नवगीतकार स्वर्गीय ठाकुरप्रसाद सिंह जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय ठाकुरप्रसाद सिंह जी की यह रचना – नदिया का घना-घना कूल हैवंशी से बेधो मत प्यारेयह मन तो बिंधा हुआ फूल हैनदिया का घना-घना कूल…
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तेरे शहर वालों में!
सौ ख़ुलूस बातों में सब करम ख़यालों में, बस ज़रा वफ़ा कम है तेरे शहर वालों में| बशीर बद्र
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दिन निकले तो सो लेना
रोते क्यूँ हो दिल वालों की क़िस्मत ऐसी होती है, सारी रात यूँही जागोगे दिन निकले तो सो लेना| बशीर बद्र
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पानी की ये पर्दा-दारी!
मैं ने दरिया से सीखी है पानी की ये पर्दा-दारी, ऊपर ऊपर हँसते रहना गहराई में रो लेना| बशीर बद्र
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अपने पाँव भिगो लेना!
कुछ तो रेत की प्यास बुझाओ जनम जनम की प्यासी है, साहिल पर चलने से पहले अपने पाँव भिगो लेना| बशीर बद्र
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साथ उसी के हो लेना!
उस के बा‘द बहुत तन्हा हो जैसे जंगल का रस्ता, जो भी तुम से प्यार से बोले साथ उसी के हो लेना| बशीर बद्र
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आस को रोकना!
आज मैं विख्यात हिन्दी नवगीतकार स्वर्गीय वीरेंद्र मिश्र जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| इनकी कुछ ही कविताएं मैंने पहले शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय वीरेंद्र मिश्र जी की यह रचना – आस को रोकनापीड़ा के नगर-द्वारों पर खड़े पहरा देनाअश्रु की राह मेंआए अगर सपन कोई उसे ठुकरा देनाहाथ से छूट…
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लिपट के रो लेना!
रेत भरी है इन आँखों में आँसू से तुम धो लेना, कोई सूखा पेड़ मिले तो उस से लिपट के रो लेना| बशीर बद्र
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ख़ुशियों के बटवारे तक
ख़ुशियों के बटवारे तक ही ऊँचे नीचे आगे पीछे, दुनिया के मिट जाने का डर जितना तेरा उतना मेरा| निदा फ़ाज़ली