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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 4th Oct 2024

    मेरी कुछ और रचनाएं-8    

    एक बार फिर से कुछ पुरानी रचनाएं मिल गईं सोचा इनको भी ढोल पीट लेता हूँ, क्योंकि बहुत समय पहले 1980 में दिल्ली छोड़ दी थी और रचनाकर्म भी लगभग छूट ही गया था| अधिकतर सुदूर प्रोजेक्ट्स में रहा और अब 7 से अधिक वर्षों से गोवा में रह रहा हूँ, जहां साहित्यिक सपोर्ट और…

  • 3rd Oct 2024

    आज का ग़म न कर!

    मिरी जान आज का ग़म न कर कि न जाने कातिब-ए-वक़्त ने,किसी अपने कल में भी भूल कर कहीं लिख रखी हों मसर्रतें| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 3rd Oct 2024

    सनम की मुरव्वतें!

    जो तुम्हारी मान लें नासेहा तो रहेगा दामन-ए-दिल में क्या,न किसी अदू की अदावतें न किसी सनम की मुरव्वतें| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 3rd Oct 2024

    वरक़ तिरी याद के!

    ये सुख़न जो हम ने रक़म किए ये हैं सब वरक़ तिरी याद के,कोई लम्हा सुब्ह-ए-विसाल का कोई शाम-ए-हिज्र की मुद्दतें| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 3rd Oct 2024

    दूरियाँ कभी क़ुर्बतें!

    सभी कुछ है तेरा दिया हुआ सभी राहतें सभी कुल्फ़तें,कभी सोहबतें कभी फ़ुर्क़तें कभी दूरियाँ कभी क़ुर्बतें| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 3rd Oct 2024

    बुतों ने की हैं जहाँ में!

    हम ऐसे सादा-दिलों की नियाज़-मंदी से,बुतों ने की हैं जहाँ में ख़ुदाइयाँ क्या क्या| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 3rd Oct 2024

    अगरचे रह में हुईं!

    पहुँच के दर पे तिरे कितने मो’तबर ठहरे,अगरचे रह में हुईं जग-हँसाइयाँ क्या क्या| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 3rd Oct 2024

    बहम हुए तो पड़ी हैं!

    जुदा थे हम तो मयस्सर थीं क़ुर्बतें कितनी,बहम हुए तो पड़ी हैं जुदाइयाँ क्या क्या| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 3rd Oct 2024

    तुम आश्ना थे तो !

    न अब रक़ीब न नासेह न ग़म-गुसार कोई,तुम आश्ना थे तो थीं आश्नाइयाँ क्या क्या| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 3rd Oct 2024

    मेरी कुछ और रचनाएं-7    

    एक बार फिर से कुछ पुरानी रचनाएं मिल गईं सोचा इनको भी ढोल पीट लेता हूँ, क्योंकि बहुत समय पहले 1980 में दिल्ली छोड़ दी थी और रचनाकर्म भी लगभग छूट ही गया था| अधिकतर सुदूर प्रोजेक्ट्स में रहा और अब 7 से अधिक वर्षों से गोवा में रह रहा हूँ, जहां साहित्यिक सपोर्ट और…

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