-
उस में होगी ख़ामी भी!
ऐसा तो मुमकिन ही नहीं है चाँद में कोई दाग़ न हो,जिस में होगी कुछ भी ख़ूबी उस में होगी ख़ामी भी| क़ैसर शमीम
-
अंदर से है खिंचाव!
मेरे अहद के इंसानों को पढ़ लेना कोई खेल नहीं, ऊपर से है मेल-मोहब्बत, अंदर से है खिंचाव बहुत| क़ैसर शमीम
-
छुपे हुए उलझाव!
अपने-आप में उलझी हुई इक दुनिया है हर शख़्स यहाँ,सुलझे हुए ज़ेहनों में भी हैं छुपे हुए उलझाव बहुत| क़ैसर शमीम
-
जिसमें नहीं घुमाव!
सोच का है ये फेर कि यारो पेच-ओ-ख़म की दुनिया में,ढूँड रहे हो ऐसा रस्ता जिस में नहीं घुमाव बहुत| क़ैसर शमीम
-
बहके से बादल हैं!
बहके बहके से बादल हैं क्या जाने ये जाएँ किधर,बदली हुई हवाओं का है उन पर आज दबाव बहुत| क़ैसर शमीम
-
टकराव बहुत!
होने लगे हैं रस्ते रस्ते, आपस के टकराव बहुत,एक साथ के चलने वालों में भी है अलगाव बहुत| क़ैसर शमीम
-
मेरी कुछ और रचनाएं-6
एक बार फिर से कुछ पुरानी रचनाएं मिल गईं सोचा इनको भी ढोल पीट लेता हूँ, क्योंकि बहुत समय पहले 1980 में दिल्ली छोड़ दी थी और रचनाकर्म भी लगभग छूट ही गया था| अधिकतर सुदूर प्रोजेक्ट्स में रहा और अब 7 से अधिक वर्षों से गोवा में रह रहा हूँ, जहां साहित्यिक सपोर्ट और…