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आँगन में न दीवार उठे!
मिरी ख़्वाहिश है कि आँगन में न दीवार उठे, मिरे भाई मिरे हिस्से की ज़मीं तू रख ले| राहत इंदौरी
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मिरे बाज़ू रख ले!
तुझ को अन-देखी बुलंदी में सफ़र करना है, एहतियातन मिरी हिम्मत मिरे बाज़ू रख ले| राहत इंदौरी
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तो ख़ुश्बू रख ले!
वो कोई जिस्म नहीं है कि उसे छू भी सकें, हाँ अगर नाम ही रखना है तो ख़ुश्बू रख ले| राहत इंदौरी
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सोने की तराज़ू रख ले!
तू जो चाहे तो तिरा झूट भी बिक सकता है, शर्त इतनी है कि सोने की तराज़ू रख ले| राहत इंदौरी
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मिरे आँसू रख ले!
इसे सामान-ए-सफ़र जान ये जुगनू रख ले, राह में तीरगी होगी मिरे आँसू रख ले| राहत इंदौरी
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वन-वन, उपवन!
एक बार फिर मैं छायावाद काल से प्रारंभ कर रहा हूँ, इस क्रम में आज मैं छायावाद के प्रमुख स्तंभ स्वर्गीय सुमित्रानंदन पंत जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| पंत जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सुमित्रानंदन पंत जी की यह रचना – वन-वन,…
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उन सियाह बालों में!
जैसे आधी शब के बा‘द चाँद नींद में चौंके, वो गुलाब की जुम्बिश उन सियाह बालों में| बशीर बद्र
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फूल के प्यालों में!
यूँ किसी की आँखों में सुब्ह तक अभी थे हम, जिस तरह रहे शबनम फूल के प्यालों में| बशीर बद्र
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जैसे कोई चुटकी ले!
रात तेरी यादों ने दिल को इस तरह छेड़ा, जैसे कोई चुटकी ले नर्म नर्म गालों में| बशीर बद्र