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शाख पर इक फूल भी है!
आज एक बार फिर मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय कुंवर बेचैन जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ। इनकी बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय डॉक्टर कुंवर बेचैन जी का यह गीत- है समय प्रतिकूल मानापर समय अनुकूल भी है।शाख पर इक फूल भी है॥ घन तिमिर…
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ये बोझ वो है जिसे!
हमेशा सर पे रही इक चटान रिश्तों की,ये बोझ वो है जिसे उम्र-भर उठाया है| राहत इंदौरी
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ठुकराओ अब के प्यार करो!
अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज मैं जगजीत सिंह जी की गाई यह ग़ज़ल अपने स्वर में प्रस्तुत कर रहा हूँ- ठुकराओ अब के प्यार करो, मैं नशे में हूँ, जो चाहे मेरे यार करो, मैं नशे में हूँ। आशा है आपको पसंद आएगी, धन्यवाद। *****
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शाम का गीत!
आज फिर से अपना एक पुराना नवगीत शेयर कर रहा हूँ, यह नवगीत अंतराल-4 में प्रकाशित हुआ था। जला हुआ लाल कोयलाराख हुआ सूर्य दिन ढले। होली सी खेल गया दिनरीते घट लौटने लगे,दिन भर के चाव लिए मनचाहें कुछ बोल रस पगे,महानगर में उंडेल दूध,गांवों को दूधिए चले।राख हुआ सूर्य दिन ढले।। ला न…