-
आश्वस्त!
आज एक बार फिर मैं श्रेष्ठ और अपनी तरह के अनूठे हिन्दी कवि स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| भवानी दादा की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी की यह कविता – हमरात-भर तैरेंगे और अगरडूब नहीं…
-
हसीनों की अंजुमन!
हमें शुऊर-ए-जुनूँ है कि जिस चमन में रहे, निगाह बन के हसीनों की अंजुमन में रहे| मजरूह सुल्तानपुरी
-
हुनर में आ गया हूँ!
छुपा न पाया कभी ख़ुद को अपने शे‘रों में, मैं जो हूँ जैसा हूँ अपने हुनर में आ गया हूँ| राजेश रेड्डी
-
भँवर में आ गया हूँ!
ये सोच कर कि न दूँ नाख़ुदा को ये ज़हमत, उतर के कश्ती से ख़ुद ही भँवर में आ गया हूँ| राजेश रेड्डी
-
तिरे हाथ की लकीरों में
न आ सका मैं तिरे हाथ की लकीरों में, यही बहुत है तिरी चश्म-ए-तर में आ गया हूँ| राजेश रेड्डी
-
अपने घर में आ गया हूँ
उदास हो गया हूँ फिर से इक ज़रा हँस कर, में घूम-घाम के फिर अपने घर में आ गया हूँ| राजेश रेड्डी
-
अपने घर में ही अजनबी की तरह!
आज एक बार फिर मैं श्रेष्ठ हिन्दी कवि और ग़ज़ल लेखक श्री सूर्यभानु गुप्त जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| गुप्त जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री सूर्यभानु गुप्त जी की यह ग़ज़ल – अपने घर में ही अजनबी की तरहमैं सुराही में…
-
ख़बर में आ गया हूँ!
मिरी शनाख़्त की ख़ातिर छपी मिरी तस्वीर, न जीते-जी सही मर के ख़बर में आ गया हूँ| राजेश रेड्डी
-
मगर मैं आ गया हूँ!
ज़रा सा फ़ासला मैं ने भी तय किया तो है, अगर से दो क़दम आगे मगर मैं आ गया हूँ| राजेश रेड्डी
-
मिरे हौसलों पे हैराँ है!
ये ज़िंदगी भी मिरे हौसलों पे हैराँ है, समझ रही थी कि मैं उस के डर में आ गया हूँ| राजेश रेड्डी