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यूँ बूँद बूँद उतरी!
पहले नहाई ओस में फिर आँसुओं में रात,यूँ बूँद बूँद उतरी हमारे घरों में रात| शहरयार
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दिन हवा होते गए!
वक़्त किस तेज़ी से गुज़रा रोज़-मर्रा में ‘मुनीर’,आज कल होता गया और दिन हवा होते गए| मुनीर नियाज़ी
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देखते ही देखते हम!
महफ़िल-आरा थे मगर फिर कम-नुमा होते गए,देखते ही देखते हम क्या से क्या होते गए| मुनीर नियाज़ी