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फ़ासला यूँ कितना है!
एक ही मिट्टी से हम दोनों बने हैं लेकिन,तुझ में और मुझ में मगर फ़ासला यूँ कितना है| शहरयार
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वो जो प्यासे थे !
वो जो प्यासे थे समुंदर से भी प्यासे लौटे,उन से पूछो कि सराबों* में फ़ुसूँ कितना है| *मृगतृष्णा शहरयार
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वो ये क्या जानें !
जम्अ करते रहे जो अपने को ज़र्रा ज़र्रा,वो ये क्या जानें बिखरने में सुकूँ कितना है| शहरयार
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अनल किरीट/ हुंकार!
आज एक बार फिर मैं हमारे राष्ट्रकवि के रूप में ख्याति प्राप्त करने वाले, प्रेम और ओज दोनों प्रकार के काव्य में प्रमुखता से सम्मान प्राप्त स्वर्गीय रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जी की एक ओजपूर्ण कविता शेयर कर रहा हूँ| दिनकर जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय…
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आँधियाँ आईं तो!
आँधियाँ आईं तो सब लोगों को मा’लूम हुआ,परचम-ए-ख़्वाब ज़माने में निगूँ कितना है| शहरयार
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नोक-ए-ख़ंजर ही!
दिल में उतरेगी तो पूछेगी जुनूँ कितना है,नोक-ए-ख़ंजर ही बताएगी कि ख़ूँ कितना है| शहरयार
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बे-सम्त मंज़िलों ने!
बे-सम्त मंज़िलों ने बुलाया है फिर हमें,सन्नाटे फिर बिछाने लगी रास्तों में रात| शहरयार
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हमको शुमार करती!
आँखों को सब की नींद भी दी ख़्वाब भी दिए,हम को शुमार करती रही दुश्मनों में रात| शहरयार