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अपना यही अमल है!
चलते हैं बच के शैख़-ओ-बरहमन के साए से, अपना यही अमल है बुरे आदमी के साथ| कैफ़ भोपाली
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घोषणापत्र!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के श्रेष्ठ कवि और बाल पत्रिका ‘पराग’ के संपादक रहे स्वर्गीय कन्हैयालाल नंदन जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| नंदन जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कन्हैयालाल नंदन जी की यह कविता – किसी नागवार गुज़रती चीज परमेरा…
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कुटिया में कौन आएगा
कुटिया में कौन आएगा इस तीरगी के साथ, अब ये किवाड़ बंद करो ख़ामुशी के साथ| कैफ़ भोपाली
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जो भी है मदारी है!
गाँव में मोहब्बत की रस्म है अभी ‘मंज़र’, शहर में हमारे तो जो भी है मदारी है| मंज़र भोपाली
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अब भी जंग जारी है!
कर्बला नहीं लेकिन झूट और सदाक़त में, कल भी जंग जारी थी अब भी जंग जारी है| मंज़र भोपाली
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ये सदी हमारी है!
कह दो ‘मीर’ ओ ‘ग़ालिब’ से हम भी शेर कहते हैं, वो सदी तुम्हारी थी ये सदी हमारी है| मंज़र भोपाली
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आज तक कुँवारी है!
बाप बोझ ढोता था क्या जहेज़ दे पाता, इस लिए वो शहज़ादी आज तक कुँवारी है| मंज़र भोपाली
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गीत तुमको भा रहे हैं!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के श्रेष्ठ गीतकार श्री बालस्वरूप राही जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| राही जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बालस्वरूप राही जी का यह गीत – मान पाया यदि नहीं कवि विश्व मुझको तो हुआ क्यायह मुझे विश्वास,…
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अब सरों की बारी है!
कुछ तो पाएँगे उस की क़ुर्बतों का ख़म्याज़ा, दिल तो हो चुके टुकड़े अब सरों की बारी है| मंज़र भोपाली