-
गुमनाम हुए!
लोग हिलाल-ए-शाम से बढ़ कर पल में माह-ए-तमाम* हुए, हम हर बुर्ज में घटते घटते सुब्ह तलक गुमनाम हुए| *Full Moon इब्न-ए-इंशा
-
चाँदनगर लिख जाएगा
तेरा नूर ज़ुहूर सलामत इक दिन तुझ पर माह-ए-तमाम, चाँद-नगर का रहने वाला चाँद-नगर लिख जाएगा| इब्न-ए-इंशा
-
दिन निकलने दे!
आज एक बार फिर मैं अपने अत्यंत प्रिय नवगीतकार स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| मेरा यह सौभाग्य रहा कि मुझे अनेक बार उनका काव्यपाठ सुनने, उनसे बात करने का भी अवसर मिला| रंजक जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमेश…
-
वो क्या दर्द बटाएगा!
दीदा ओ दिल ने दर्द की अपने बात भी की तो किस से की, वो तो दर्द का बानी ठहरा वो क्या दर्द बटाएगा| इब्न-ए-इंशा
-
पत्थर का बन जाएगा!
हाँ यही शख़्स गुदाज़ और नाज़ुक होंटों पर मुस्कान लिए, ऐ दिल अपने हाथ लगाते पत्थर का बन जाएगा| इब्न-ए-इंशा
-
वहशी फूल खिलाएगा!
शहरों को वीरान करेगा अपनी आँच की तेज़ी से, वीरानों में मस्त अलबेले वहशी फूल खिलाएगा| इब्न-ए-इंशा
-
सूरज को शरमाएगा!
राज़ कहाँ तक राज़ रहेगा मंज़र-ए-आम पे आएगा, जी का दाग़ उजागर हो कर सूरज को शरमाएगा| इब्न-ए-इंशा
-
दिया कह लिया करो!
ले दे के अब यही है निशान-ए-ज़िया ‘क़तील’, जब दिल जले तो इस को दिया कह लिया करो| क़तील शिफ़ाई
-
एक राह-ए-नजात है
अपने लिए अब एक ही राह-ए-नजात है, हर ज़ुल्म को रज़ा-ए-ख़ुदा कह लिया करो| क़तील शिफ़ाई
-
इस मोड़ से तुम मुड़ गई!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के एक प्रमुख कवि तथा आपातकाल में लिखी गई ग़ज़लों के संग्रह ‘साए में धूप’ के माध्यम से विशेष ख्याति प्राप्त करने वाले स्वर्गीय दुष्यंत कुमार जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| दुष्यंत जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है…