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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 1st May 2024

    मिरा आसमान था सारा!

    जो पर समेटे तो इक शाख़ भी नहीं पाई, खुले थे पर तो मिरा आसमान था सारा| जावेद अख़्तर

  • 1st May 2024

    रक्खा हुआ ये अँगारा!

    किसी की आँख से टपका था इक अमानत है, मिरी हथेली पे रक्खा हुआ ये अँगारा| जावेद अख़्तर 

  • 1st May 2024

    बरस के खुल गए आँसू!

    बरस के खुल गए आँसू निथर गई है फ़ज़ा, चमक रहा है सर-ए-शाम दर्द का तारा| जावेद अख़्तर

  • 1st May 2024

    वो मुझ से जीत भी सकता था!

    मैं पा सका न कभी इस ख़लिश से छुटकारा, वो मुझ से जीत भी सकता था जाने क्यूँ हारा| जावेद अख़्तर

  • 1st May 2024

    संजीदा मसअले हैं हम!

    क्यूँ हैं कब तक हैं किस की ख़ातिर हैं, बड़े संजीदा मसअले हैं हम| जावेद अख़्तर

  • 1st May 2024

    ढाला है और ढले हैं हम!

    तू तो मत कह हमें बुरा दुनिया, तू ने ढाला है और ढले हैं हम| जावेद अख़्तर

  • 1st May 2024

    पैरों के आबले हैं हम!

    ख़ुद हैं अपने सफ़र की दुश्वारी, अपने पैरों के आबले* हैं हम| *छाले जावेद अख़्तर

  • 1st May 2024

    अनपहचाना घाट!  

    आज एक बार फिर मैं हिन्दी के प्रसिद्ध कवि स्वर्गीय श्रीकांत वर्मा जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय श्रीकांत वर्मा जी की यह कविता – धूप से लिपटे हुए धुएँ सरीखेकेश, सब लहरा रहे हैंप्राण तेरे स्कंध पर !! यह…

  • 30th Apr 2024

    किस तरह जले हैं हम!

    छाछ फूंकें कि अपने बचपन में, दूध से किस तरह जले हैं हम| जावेद अख़्तर

  • 30th Apr 2024

    पानी छलनी में ले चले हैं हम!

    ख़्वाब के गाँव में पले हैं हम, पानी छलनी में ले चले हैं हम| जावेद अख़्तर

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