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रक्खा हुआ ये अँगारा!
किसी की आँख से टपका था इक अमानत है, मिरी हथेली पे रक्खा हुआ ये अँगारा| जावेद अख़्तर
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बरस के खुल गए आँसू!
बरस के खुल गए आँसू निथर गई है फ़ज़ा, चमक रहा है सर-ए-शाम दर्द का तारा| जावेद अख़्तर
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वो मुझ से जीत भी सकता था!
मैं पा सका न कभी इस ख़लिश से छुटकारा, वो मुझ से जीत भी सकता था जाने क्यूँ हारा| जावेद अख़्तर
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पैरों के आबले हैं हम!
ख़ुद हैं अपने सफ़र की दुश्वारी, अपने पैरों के आबले* हैं हम| *छाले जावेद अख़्तर
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अनपहचाना घाट!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के प्रसिद्ध कवि स्वर्गीय श्रीकांत वर्मा जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय श्रीकांत वर्मा जी की यह कविता – धूप से लिपटे हुए धुएँ सरीखेकेश, सब लहरा रहे हैंप्राण तेरे स्कंध पर !! यह…