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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 7th Nov 2024

    हिले ठंडी हवाओं में!

    घिरा बादल ख़मोशी से ख़िज़ाँ-आसार बाग़ों पर, हिले ठंडी हवाओं में शजर आहिस्ता आहिस्ता| मुनीर नियाज़ी

  • 7th Nov 2024

    हुआ ख़ाली सदाओं से!

    उगा सब्ज़ा दर-ओ-दीवार पर आहिस्ता आहिस्ता,हुआ ख़ाली सदाओं से नगर आहिस्ता आहिस्ता| मुनीर नियाज़ी

  • 6th Nov 2024

    उन हसीनों के हमें!

    छिन गए हम से जो हालात की राहों में ‘क़तील’,उन हसीनों के हमें अब भी पयाम आते हैं| क़तील शिफ़ाई

  • 6th Nov 2024

    याद अक्सर वो हमें !

    हम पे हो जाएँ न कुछ और भी रातें भारी,याद अक्सर वो हमें अब सर-ए-शाम आते हैं| क़तील शिफ़ाई

  • 6th Nov 2024

    हम न चाहें तो!

    हम न चाहें तो कभी शाम के साए न ढलें,हम तड़पते हैं तो सुब्हों के सलाम आते हैं| क़तील शिफ़ाई

  • 6th Nov 2024

    उन को ऐसे कई!

    ज़िंदगी बन के वो चलते हैं मिरी साँस के साथ,उन को ऐसे कई अंदाज़-ए-ख़िराम आते हैं| क़तील शिफ़ाई

  • 6th Nov 2024

    प्यास मिट जाए तो!

    उन की आँखों से रखे क्या कोई उम्मीद-ए-करम,प्यास मिट जाए तो गर्दिश में वो जाम आते हैं| क़तील शिफ़ाई

  • 6th Nov 2024

    बीते दिन!

    आज मैं हिन्दी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय कैलाश गौतम जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| कैलाश जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कैलाश गौतम जी की यह कविता – बीते दिनमैं भूल नहीं पाता,था कोई जोमुझे देखकरमई जून की तेज़ धूप मेंमेरे आगे हो…

  • 5th Nov 2024

    सिर्फ़ आँसू जहाँ!

    प्यार की राह में ऐसे भी मक़ाम आते हैं,सिर्फ़ आँसू जहाँ इंसान के काम आते हैं| क़तील शिफ़ाई

  • 5th Nov 2024

    मुख़्तसर न कर दे!

    ‘क़तील’ ये वस्ल के ज़माने हसीन भी हैं तवील भी हैं,मगर लगा है ये दिल को धड़का इन्हें कोई मुख़्तसर न कर दे| क़तील शिफ़ाई

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