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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 8th Nov 2024

    बुत का जी बुरा न हो!

    मैं इस ख़याल से जाता नहीं वतन की तरफ़,कि मुझ को देख के उस बुत का जी बुरा ही न हो| मुनीर नियाज़ी

  • 8th Nov 2024

    तो रास्ता ही न हो!

    न जा कि इस से परे दश्त-ए-मर्ग हो शायद,पलटना चाहें वहाँ से तो रास्ता ही न हो| मुनीर नियाज़ी

  • 8th Nov 2024

    जो तैरता ही न हो!

    ज़मीं के गिर्द भी पानी ज़मीं की तह में भी,ये शहर जम के खड़ा है जो तैरता ही न हो| मुनीर नियाज़ी

  • 8th Nov 2024

    प्रस्तुत!

    आज मैं हिन्दी की श्रेष्ठ कवियित्री स्वर्गीया कीर्ति चौधरी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| यह कविता अज्ञेय जी द्वारा संपादित तीसरा सप्तक में सम्मिलित थी| कीर्ति जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीया कीर्ति चौधरी जी की यह कविता – मैं प्रस्तुत हूँ,इन कई…

  • 7th Nov 2024

    दिखाई देता है जो!

    निगाह-ए-आईना मालूम अक्स ना-मालूम, दिखाई देता है जो असल में छुपा ही न हो| मुनीर नियाज़ी

  • 7th Nov 2024

    कहीं हवा ही न हो!

    सफ़र में है जो अज़ल से ये वो बला ही न हो,किवाड़ खोल के देखो कहीं हवा ही न हो| मुनीर नियाज़ी

  • 7th Nov 2024

    कि हरकत तेज़-तर है!

    ‘मुनीर’ इस मुल्क पर आसेब का साया है या क्या है,कि हरकत तेज़-तर है और सफ़र आहिस्ता आहिस्ता| मुनीर नियाज़ी

  • 7th Nov 2024

    मिरे बाहर फ़सीलें थीं!

    मिरे बाहर फ़सीलें थीं गुबार-ए-ख़ाक-ओ-बाराँ की,मिली मुझ को तिरे ग़म की ख़बर आहिस्ता आहिस्ता| मुनीर नियाज़ी

  • 7th Nov 2024

    साँप ने जिस्मों में!

    चमक ज़र की उसे आख़िर मकान-ए-ख़ाक में लाई,बनाया साँप ने जिस्मों में घर आहिस्ता आहिस्ता| मुनीर नियाज़ी

  • 7th Nov 2024

    सुस्त था मंज़र!

    बहुत ही सुस्त था मंज़र लहू के रंग लाने का,निशाँ आख़िर हुआ ये सुर्ख़-तर आहिस्ता आहिस्ता| मुनीर नियाज़ी

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