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वो भी पेश आये हैं!
जिनके ख़ातिर कभी इल्ज़ाम उठाये, “फ़ाकिर”,वो भी पेश आये हैं इंसाफ़ के शाहों की तरह| सुदर्शन फ़ाकिर
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बस तेरी याद के!
हर तरफ़ ज़ीस्त की राहों में कड़ी धूप है दोस्त,बस तेरी याद के साये हैं पनाहों की तरह| सुदर्शन फ़ाकिर
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दिल ही दुश्मन हैं!
अपनी नज़रों में गुनाहगार न होते, क्यों कर,दिल ही दुश्मन हैं मुख़ालिफ़ के गवाहों की तरह| सुदर्शन फ़ाकिर
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ग़म बढे़ आते हैं!
ग़म बढे़ आते हैं क़ातिल की निगाहों की तरह,तुम छिपा लो मुझे, ऐ दोस्त, गुनाहों की तरह| सुदर्शन फ़ाकिर
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मुझे पुकारती हुई पुकार!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी साहित्य में अपनी तरह के अनूठे कवि स्वर्गीय गजानन माधव मुक्तिबोध जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| मुक्तिबोध जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय गजानन माधव मुक्तिबोध जी की यह कविता – मुझे पुकारती हुई पुकार खो गई…
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ख़ौफ़ में डूबे हुए!
ख़ौफ़ में डूबे हुए शहर की क़िस्मत है यही,मुंतज़िर रहता है हर शख़्स कि क्या होता है| मुनव्वर राना
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मुस्तक़िल ज़ख़्म का!
मैं भुलाना भी नहीं चाहता इस को लेकिन,मुस्तक़िल ज़ख़्म का रहना भी बुरा होता है| मुनव्वर राना
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कोई मंज़र हो!
सारी दुनिया का सफ़र ख़्वाब में कर डाला है,कोई मंज़र हो मिरा देखा हुआ होता है| मुनव्वर राना
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अपनी मिट्टी से हर
ख़ाक आँखों से लगाई तो ये एहसास हुआ,अपनी मिट्टी से हर इक शख़्स जुड़ा होता है| मुनव्वर राना
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दो पाटों की दुनिया!
आज एक बार फिर मैं अपने समय के हिन्दी के श्रेष्ठ कवि और अज्ञेय जी द्वारा संकलित ‘तारसप्तक’ के एक सम्मानित कवि स्वर्गीय गिरिजाकुमार माथुर जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इनकी बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय गिरिजाकुमार माथुर जी की यह कविता –…