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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 22nd May 2024

    रेशम के रूमाल की!

    महक अजब सी हो गई पड़े पड़े संदूक़ में, रंगत फीकी पड़ गई रेशम के रूमाल की| मुनीर नियाज़ी

  • 22nd May 2024

    यही सदा घड़ियाल की

    आई है अब याद क्या रात इक बीते साल की, यही हवा थी बाग़ में यही सदा घड़ियाल की| मुनीर नियाज़ी

  • 22nd May 2024

    चलो घूम आएँ!  

    आज एक बार फिर मैं श्रेष्ठ हिन्दी कवि और समाचार पत्रिका ‘दिनमान’ के संपादक मण्डल में शामिल स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| सर्वेश्वर जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी की यह कविता – उठो, कब…

  • 21st May 2024

    ख़ुश हुए कुछ रंजूर हुए

    हम उन से जो मिल कर दूर हुए कुछ ख़ुश हुए कुछ रंजूर हुए, अब दिल का ठिकाना मुश्किल है हाँ जान रहेगी ऐमन में| इब्न-ए-इंशा

  • 21st May 2024

    फूल बने जा गुलशन में

    कुछ वो जिन्हें हम से निस्बत थी उन कूचों में आन आबाद हुए, कुछ अर्श पे तारे कहलाए कुछ फूल बने जा गुलशन में| इब्न-ए-इंशा

  • 21st May 2024

    फूल खिले पैराहन में!

    उस हुस्न के नाम पे याद आए सब मंज़र ‘फ़ैज़’ की नज़्मों के, वही रंग-ए-हिना वही बंद-ए-क़बा वही फूल खिले पैराहन में| इब्न-ए-इंशा

  • 21st May 2024

    रात क़याम करो!

    जंगल जंगल शौक़ से घूमो दश्त की सैर मुदाम करो, ‘इंशा’-जी हम पास भी लेकिन रात की रात क़याम करो| इब्न-ए-इंशा

  • 21st May 2024

    छपने अख़बार के बीच

    मिन्नत-ए-क़ासिद कौन उठाए शिकवा-ए-दरबाँ कौन करे, नामा-ए-शौक़ ग़ज़ल की सूरत छपने को दो अख़बार के बीच| इब्न-ए-इंशा

  • 21st May 2024

    शहर-ए-निगार!

    ऐ सख़ियो ऐ ख़ुश-नज़रो यक गूना करम ख़ैरात करो, नारा-ज़नाँ कुछ लोग फिरें हैं सुब्ह से शहर-ए-निगार* के बीच| *CityOfBeauty इब्न-ए-इंशा

  • 21st May 2024

    भरी बहार के बीच!

    पीना-पिलाना ऐन गुनह है जी का लगाना ऐन हवस, आप की बातें सब सच्ची हैं लेकिन भरी बहार के बीच| इब्न-ए-इंशा

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