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रेशम के रूमाल की!
महक अजब सी हो गई पड़े पड़े संदूक़ में, रंगत फीकी पड़ गई रेशम के रूमाल की| मुनीर नियाज़ी
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यही सदा घड़ियाल की
आई है अब याद क्या रात इक बीते साल की, यही हवा थी बाग़ में यही सदा घड़ियाल की| मुनीर नियाज़ी
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चलो घूम आएँ!
आज एक बार फिर मैं श्रेष्ठ हिन्दी कवि और समाचार पत्रिका ‘दिनमान’ के संपादक मण्डल में शामिल स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| सर्वेश्वर जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी की यह कविता – उठो, कब…
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ख़ुश हुए कुछ रंजूर हुए
हम उन से जो मिल कर दूर हुए कुछ ख़ुश हुए कुछ रंजूर हुए, अब दिल का ठिकाना मुश्किल है हाँ जान रहेगी ऐमन में| इब्न-ए-इंशा
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फूल बने जा गुलशन में
कुछ वो जिन्हें हम से निस्बत थी उन कूचों में आन आबाद हुए, कुछ अर्श पे तारे कहलाए कुछ फूल बने जा गुलशन में| इब्न-ए-इंशा
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फूल खिले पैराहन में!
उस हुस्न के नाम पे याद आए सब मंज़र ‘फ़ैज़’ की नज़्मों के, वही रंग-ए-हिना वही बंद-ए-क़बा वही फूल खिले पैराहन में| इब्न-ए-इंशा
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रात क़याम करो!
जंगल जंगल शौक़ से घूमो दश्त की सैर मुदाम करो, ‘इंशा’-जी हम पास भी लेकिन रात की रात क़याम करो| इब्न-ए-इंशा
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छपने अख़बार के बीच
मिन्नत-ए-क़ासिद कौन उठाए शिकवा-ए-दरबाँ कौन करे, नामा-ए-शौक़ ग़ज़ल की सूरत छपने को दो अख़बार के बीच| इब्न-ए-इंशा
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शहर-ए-निगार!
ऐ सख़ियो ऐ ख़ुश-नज़रो यक गूना करम ख़ैरात करो, नारा-ज़नाँ कुछ लोग फिरें हैं सुब्ह से शहर-ए-निगार* के बीच| *CityOfBeauty इब्न-ए-इंशा
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भरी बहार के बीच!
पीना-पिलाना ऐन गुनह है जी का लगाना ऐन हवस, आप की बातें सब सच्ची हैं लेकिन भरी बहार के बीच| इब्न-ए-इंशा