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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 25th May 2024

    शदीद प्यास थी!

    शदीद प्यास थी फिर भी छुआ न पानी को, मैं देखता रहा दरिया तिरी रवानी को| शहरयार

  • 25th May 2024

    ये जीवन है!

    मैंने ब्लॉग लेखन प्रारंभ किया था लगभग 7 वर्ष पहले| प्रारंभ में मैंने अपने जीवन, सेवाकाल, कविता की दुनिया, कवि मित्रों आदि के विषय में संस्मरण आदि लिखे, श्रेष्ठ कवियों की कविताएं, शायरी आदि को तो मैं शेयर करता ही रहता हूँ, जब कहीं जाने का अवसर मिलता है तो यात्रा संबंधी अनुभव भी शेयर…

  • 24th May 2024

    तीरगी से समझौता!

    ज़मीं ने कर लिया क्या तीरगी से समझौता, ख़याल छोड़ चुके क्या चराग़ जलने का| शहरयार

  • 24th May 2024

    बिगड़ गया जो ये!

    बिगड़ गया जो ये नक़्शा हवस के हाथों से, तो फिर किसी के सँभाले नहीं सँभलने का| शहरयार

  • 24th May 2024

    कश्तियाँ बदलने का!

    कहीं न सब को समुंदर बहा के ले जाए, ये खेल ख़त्म करो कश्तियाँ बदलने का| शहरयार

  • 24th May 2024

    परछाइयों के चलने का

    यहाँ से गुज़रे हैं गुज़़रेंगे हम से अहल-ए-वफ़ा, ये रास्ता नहीं परछाइयों के चलने का| शहरयार

  • 24th May 2024

    यही तो वक़्त है!

    सियाह रात नहीं लेती नाम ढलने का, यही तो वक़्त है सूरज तिरे निकलने का| शहरयार

  • 24th May 2024

    बहुरूपिया!  

    आज एक बार फिर मैं प्रसिद्ध आंचलिक उपन्यासकार और कवि स्वर्गीय फणीश्वर नाथ रेणु जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय फणीश्वर नाथ रेणु जी की यह कविता – दुनिया दूषती हैहँसती हैउँगलियाँ उठा कहती है …कहकहे कसती है –राम…

  • 23rd May 2024

    फिर सोचें वो बातें!

    बैठ जाएँ साया-ए-दामान-ए-अहमद में ‘मुनीर’, और फिर सोचें वो बातें जिन को होना है अभी| मुनीर नियाज़ी

  • 23rd May 2024

    मिट्टी में सोना है अभी!

    हम ने खिलते देखना है फिर ख़याबान-ए-बहार, शहर के अतराफ़* की मिट्टी में सोना है अभी| *आसपास मुनीर नियाज़ी

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