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ये जीवन है!
मैंने ब्लॉग लेखन प्रारंभ किया था लगभग 7 वर्ष पहले| प्रारंभ में मैंने अपने जीवन, सेवाकाल, कविता की दुनिया, कवि मित्रों आदि के विषय में संस्मरण आदि लिखे, श्रेष्ठ कवियों की कविताएं, शायरी आदि को तो मैं शेयर करता ही रहता हूँ, जब कहीं जाने का अवसर मिलता है तो यात्रा संबंधी अनुभव भी शेयर…
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बिगड़ गया जो ये!
बिगड़ गया जो ये नक़्शा हवस के हाथों से, तो फिर किसी के सँभाले नहीं सँभलने का| शहरयार
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परछाइयों के चलने का
यहाँ से गुज़रे हैं गुज़़रेंगे हम से अहल-ए-वफ़ा, ये रास्ता नहीं परछाइयों के चलने का| शहरयार
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बहुरूपिया!
आज एक बार फिर मैं प्रसिद्ध आंचलिक उपन्यासकार और कवि स्वर्गीय फणीश्वर नाथ रेणु जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय फणीश्वर नाथ रेणु जी की यह कविता – दुनिया दूषती हैहँसती हैउँगलियाँ उठा कहती है …कहकहे कसती है –राम…
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फिर सोचें वो बातें!
बैठ जाएँ साया-ए-दामान-ए-अहमद में ‘मुनीर’, और फिर सोचें वो बातें जिन को होना है अभी| मुनीर नियाज़ी
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मिट्टी में सोना है अभी!
हम ने खिलते देखना है फिर ख़याबान-ए-बहार, शहर के अतराफ़* की मिट्टी में सोना है अभी| *आसपास मुनीर नियाज़ी