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ख़ुद इश्क़ की नज़रों में
अल्फ़ाज़ में इज़हार-ए-मोहब्बत के तरीक़े, ख़ुद इश्क़ की नज़रों में भी मायूब रहे हैं| जाँ निसार अख़्तर
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कुछ और भी चेहरे!
हम भी तिरी सूरत के परस्तार हैं लेकिन, कुछ और भी चेहरे हमें मर्ग़ूब रहे हैं| जाँ निसार अख़्तर
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जो दर्द किसी नाम से!
उन को न पुकारो ग़म-ए-दौराँ के लक़ब से, जो दर्द किसी नाम से मंसूब रहे हैं| जाँ निसार अख़्तर
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कहीं डूब रहे हैं!
तूफ़ान की आवाज़ तो आती नहीं लेकिन, लगता है सफ़ीने से कहीं डूब रहे हैं| जाँ निसार अख़्तर
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दौर में महबूब रहे हैं!
वो लोग ही हर दौर में महबूब रहे हैं, जो इश्क़ में तालिब नहीं मतलूब* रहे हैं| *प्रेमपात्र जाँ निसार अख़्तर
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बहुत क़रीब थे हम!
मैं तेरी ज़ात में गुम हो सका न तू मुझ में, बहुत क़रीब थे हम फिर भी फ़ासला तो रहा| जाँ निसार अख़्तर
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सुई!
आज मैं हिन्दी और राजस्थानी भाषाओं के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय हरीश भादानी जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| भादानी जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय हरीश भादानी जी का यह गीत – सुबह उधेड़े शाम उधेड़ेबजती हुई सुई सीलन और धुएं के खेतों दिन भर…
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मुक़ाबला तो रहा|
चलो न इश्क़ ही जीता न अक़्ल हार सकी, तमाम वक़्त मज़े का मुक़ाबला तो रहा| जाँ निसार अख़्तर
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क़दम क़दम पे कोई!
गुज़र ही आए किसी तरह तेरे दीवाने, क़दम क़दम पे कोई सख़्त मरहला तो रहा| जाँ निसार अख़्तर
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हौसला तो रहा!
तमाम उम्र अज़ाबों का सिलसिला तो रहा, ये कम नहीं हमें जीने का हौसला तो रहा| जाँ निसार अख़्तर