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दिलों को ग़ुलाम करो!
कब से खड़े हैं बर में ख़िराज-ए-इश्क़ के लिए सर-ए-राहगुज़ार, एक नज़र से सादा-रुख़ो हम सादा-दिलों को ग़ुलाम करो| इब्न-ए-इंशा
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रात क़याम करो!
जंगल जंगल शौक़ से घूमो दश्त की सैर मुदाम करो, ‘इंशा‘-जी हम पास भी लेकिन रात की रात क़याम करो| इब्न-ए-इंशा
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अख़बार के बीच!
मिन्नत-ए-क़ासिद कौन उठाए शिकवा-ए-दरबाँ कौन करे, नामा-ए-शौक़ ग़ज़ल की सूरत छपने को दो अख़बार के बीच| इब्न-ए-इंशा
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तुझी को ख़बर न मिले
ख़ार-ओ-ख़स-ओ-ख़ाशाक तो जानें एक तुझी को ख़बर न मिले, ऐ गुल-ए-ख़ूबी हम तो अबस बदनाम हुए गुलज़ार के बीच| इब्न-ए-इंशा
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भरी बहार के बीच
पीना-पिलाना ऐन गुनह है जी का लगाना ऐन हवस, आप की बातें सब सच्ची हैं लेकिन भरी बहार के बीच| इब्न-ए-इंशा
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दिल सी चीज़ के!
दिल सी चीज़ के गाहक होंगे दो या एक हज़ार के बीच, ‘इंशा‘ जी क्या माल लिए बैठे हो तुम बाज़ार के बीच| इब्न-ए-इंशा
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चार दिन अवकाश
एक बार फिर मैं 26 से 29 जून तक ब्लॉगिंग प्लेटफ़ॉर्म और फेसबुक आदि से दूर रहूँगा, और इस दौरान कोई नई पोस्ट नहीं डालूँगा|
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आओ मिल आएँ!
दो घड़ी आओ मिल आएँ किसी ‘ग़ालिब’ से ‘क़तील’, हज़रत-ए-‘ज़ौक़’ तो वाबस्ता हैं दरबार के साथ| क़तील शिफ़ाई
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दुश्मनी मुझसे किए जा
दुश्मनी मुझ से किए जा मगर अपना बन कर, जान ले ले मिरी सय्याद मगर प्यार के साथ| क़तील शिफ़ाई
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इक न इक ख़ौफ़ भी है
लफ़्ज़ चुनता हूँ तो मफ़्हूम* बदल जाता है, इक न इक ख़ौफ़ भी है जुरअत-ए-इज़हार के साथ| *Meaning क़तील शिफ़ाई