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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 31st Dec 2024

    मिरी आँखों को आँसू!

    मोहब्बत ना-रवा तक़्सीम की क़ाएल नहीं फिर भी,मिरी आँखों को आँसू तेरे होंटों को हँसी दी है| जाँ निसार अख़्तर

  • 31st Dec 2024

    पिघलते आबशारों ने!

    नज़र को सब्ज़ मैदानों ने क्या क्या वुसअतें बख़्शीं,पिघलते आबशारों ने हमें दरिया-दिली दी है| जाँ निसार अख़्तर

  • 31st Dec 2024

    किसी ने धूप बख़्शी है!

    मिरे ख़ल्वत-कदे के रात दिन यूँही नहीं सँवरेकिसी ने धूप बख़्शी है किसी ने चाँदनी दी है जाँ निसार अख़्तर

  • 31st Dec 2024

    शगुफ़्ता ताज़गी दी है!

    बहुत दिल कर के होंटों की शगुफ़्ता ताज़गी दी है,चमन माँगा था पर उस ने ब-मुश्किल इक कली दी है| जाँ निसार अख़्तर

  • 31st Dec 2024

    क्‍या वो दिन भी दिन हैं!

    आज मैं प्रसिद्ध साहित्यकार और शायर स्वर्गीय राही मासूम रज़ा साहब की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ। राही मासूम रज़ा साहब की रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय राही मासूम रज़ा साहब की यह ग़ज़ल – क्‍या वो दिन भी दिन हैं जिनमें दिन भर जी घबराएक्‍या वो…

  • 30th Dec 2024

    राह नज़दीक की!

    दिल में भी मिलता है वो काबा भी उस का है मक़ाम, राह नज़दीक की ऐ अज़्म-ए-सफ़र पैदा कर| बेख़ुद देहलवी

  • 30th Dec 2024

    तीर बन जाए निशाना!

    मुझ से कहती है कड़क कर ये कमाँ क़ातिल की,तीर बन जाए निशाना वो जिगर पैदा कर| बेख़ुद देहलवी

  • 30th Dec 2024

    अभी घर पैदा कर!

    मुझ से घर आने के वादे पर बिगड़ कर बोले,कह दिया ग़ैर के दिल में अभी घर पैदा कर| बेख़ुद देहलवी

  • 30th Dec 2024

    दिन निकलने को है!

    दिन निकलने को है राहत से गुज़र जाने दे,रूठ कर तू न क़यामत की सहर पैदा कर| बेख़ुद देहलवी

  • 30th Dec 2024

    रंज सहने को हमारा!

    शिकवा-ए-दर्द-ए-जुदाई पे वो फ़रमाते हैं,रंज सहने को हमारा सा जिगर पैदा कर| बेख़ुद देहलवी

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