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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 27th Dec 2024

    आग तो नज़र आए!

    धुआँ नहीं न सही आग तो नज़र आए,यूँ चुपके चुपके सुलगने से फ़ाएदा क्या है| क़ैसर शमीम

  • 27th Dec 2024

    सवाल सा क्या है!

    तुझे पसंद कहाँ हाल पूछना मेरा,तिरी निगाह में लेकिन सवाल सा क्या है| क़ैसर शमीम

  • 27th Dec 2024

    रहेगी धूप मिरे सर पे!

    रहेगी धूप मिरे सर पे आख़िरी दिन तक,जवाँ है पेड़ मगर उस का आसरा क्या है| क़ैसर शमीम

  • 27th Dec 2024

    देखूँ कि इंतिहा क्या है!

    अभी तो काट रही है हर एक साँस की धार,अज़ल जब आए तो देखूँ कि इंतिहा क्या है| क़ैसर शमीम

  • 27th Dec 2024

    भूली-बिसरी तस्वीरें!

    नज़र की धुँद में हैं भूली-बिसरी तस्वीरें,पलट के देखने वाले ये देखना क्या है| क़ैसर शमीम

  • 27th Dec 2024

    धूल के सिवा क्या है!

    शिकस्ता ख़्वाब के मलबे में ढूँढता क्या है,खंडर खंडर है यहाँ धूल के सिवा क्या है| क़ैसर शमीम

  • 27th Dec 2024

    अरे, अब ऐसी कविता लिखो!

    आज मैं श्रेष्ठ हिंदी संपादक और कवि स्वर्गीय रघुवीर सहाय जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। रघुवीर सहाय जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रघुवीर सहाय जी की यह कविता – अरे, अब ऐसी कविता लिखोकि जिसमें छन्द घूमकर आयघुमड़ता जाय देह में दर्दकहीं…

  • 26th Dec 2024

    ज़ाग़ ओ ज़ग़न तमाम!

    समझे हैं अहल-ए-शर्क़ को शायद क़रीब-ए-मर्ग,मग़रिब के यूँ हैं जम्अ’ ये ज़ाग़ ओ ज़ग़न तमाम| हसरत मोहानी

  • 26th Dec 2024

    किए जाएँ सख़्तियाँ!

    अच्छा है अहल-ए-जौर किए जाएँ सख़्तियाँ,फैलेगी यूँ ही शोरिश-ए-हुब्ब-ए-वतन तमाम| हसरत मोहानी

  • 26th Dec 2024

    गुलज़ार बन गई है!

    उस नाज़नीं ने जब से किया है वहाँ क़याम,गुलज़ार बन गई है ज़मीन-ए-दकन तमाम| हसरत मोहानी

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