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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 4th Jul 2024

    साँस कैसे रुकती है!

    कोई कैसे मिलता है फूल कैसे खिलता है आँख कैसे झुकती है साँस कैसे रुकती है, कैसे रह निकलती है कैसे बात चलती है शौक़ की ज़बाँ क्या है तुम न जान पाओगे| जावेद अख़्तर

  • 4th Jul 2024

    शहर के दुकाँ-दारो!

    शहर के दुकाँ-दारो कारोबार-ए-उल्फ़त में सूद क्या ज़ियाँ क्या है तुम न जान पाओगे, दिल के दाम कितने हैं ख़्वाब कितने महँगे हैं और नक़्द-ए-जाँ क्या है तुम न जान पाओगे| जावेद अख़्तर

  • 4th Jul 2024

    ज़िन्दगी नेपथ्य में गुज़री!

    आज एक बार फिर मैं हिन्दी के श्रेष्ठकवि स्वर्गीय उमाकांत मालवीय जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| मालवीय जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय उमाकांत मालवीय जी का यह नवगीत-   ज़िन्दगी नेपथ्य में गुज़रीमंच पर की भूमिका तो सिर्फ अभिनय है । मूल से…

  • 3rd Jul 2024

    वाक़िए हो गए!

    हाए क्या दौर-ए-ज़िंदगी गुज़रा, वाक़िए हो गए कहानी से| गुलज़ार देहलवी

  • 3rd Jul 2024

    सरा-ए-फ़ानी से!

    हसरत-ए-उम्र-ए-जावेदाँ ले कर, जा रहे हैं सरा-ए-फ़ानी से| गुलज़ार देहलवी

  • 3rd Jul 2024

    आग बुझती नहीं है!

    दिल सुलगता है अश्क बहते हैं, आग बुझती नहीं है पानी से| गुलज़ार देहलवी

  • 3rd Jul 2024

    तिरी जवानी से!

    और भी क्या क़यामत आएगी, पूछना है तिरी जवानी से| गुलज़ार देहलवी

  • 3rd Jul 2024

    हम से पूछो तो!

    हम से पूछो तो ज़ुल्म बेहतर है, इन हसीनों की मेहरबानी से| गुलज़ार देहलवी

  • 3rd Jul 2024

    धुल गए नक़्श!

    ख़ाक से कितनी सूरतें उभरीं, धुल गए नक़्श कितने पानी से| गुलज़ार देहलवी

  • 3rd Jul 2024

    दिल उलझता है!

    उस सितमगर की मेहरबानी से, दिल उलझता है ज़िंदगानी से| गुलज़ार देहलवी

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