-
साँस कैसे रुकती है!
कोई कैसे मिलता है फूल कैसे खिलता है आँख कैसे झुकती है साँस कैसे रुकती है, कैसे रह निकलती है कैसे बात चलती है शौक़ की ज़बाँ क्या है तुम न जान पाओगे| जावेद अख़्तर
-
शहर के दुकाँ-दारो!
शहर के दुकाँ-दारो कारोबार-ए-उल्फ़त में सूद क्या ज़ियाँ क्या है तुम न जान पाओगे, दिल के दाम कितने हैं ख़्वाब कितने महँगे हैं और नक़्द-ए-जाँ क्या है तुम न जान पाओगे| जावेद अख़्तर
-
ज़िन्दगी नेपथ्य में गुज़री!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के श्रेष्ठकवि स्वर्गीय उमाकांत मालवीय जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| मालवीय जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय उमाकांत मालवीय जी का यह नवगीत- ज़िन्दगी नेपथ्य में गुज़रीमंच पर की भूमिका तो सिर्फ अभिनय है । मूल से…