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ये बुत जो हम ने!
ये बुत जो हम ने दोबारा बना के रक्खा है,इसी ने हम को तमाशा बना के रक्खा है| मुनव्वर राना
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बेवफ़ाई खेल का!
बेवफ़ाई खेल का हिस्सा है जाने दे इसे,तज़्किरा उस से न कर शर्मिंदगी बढ़ जाएगी| मुनव्वर राना
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आप के हँसने से!
आप के हँसने से ख़तरा और भी बढ़ जाएगा,इस तरह तो और आँखों की नमी बढ़ जाएगी| मुनव्वर राना
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दुश्मनी बढ़ जाएगी!
इतनी चाहत से न देखा कीजिए महफ़िल में आप,शहर वालों से हमारी दुश्मनी बढ़ जाएगी| मुनव्वर राना
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आप के आने से थोड़ी!
मौत का आना तो तय है मौत आएगी मगर,आप के आने से थोड़ी ज़िंदगी बढ़ जाएगी| मुनव्वर राना
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रौशनी बढ़ जाएगी!
मुख़्तसर होते हुए भी ज़िंदगी बढ़ जाएगी,माँ की आँखें चूम लीजे रौशनी बढ़ जाएगी| मुनव्वर राना
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क़ाफ़िला ख़्वाबों का!
गर्द-ए-राह की सूरत साँस साँस है ऐ ‘नूर’,मीर-ए-कारवाँ मैं हूँ क़ाफ़िला है ख़्वाबों का| कृष्ण बिहारी नूर
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जीना हो तो मरने से नहीं डरो रे !
आज मैं शृंगार और ओज दोनो प्रकार की श्रेष्ठतम रचनाएं देने वाले, राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर जी की एक ओजपूर्ण कविता शेयर कर रहा हूँ। दिनकर जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रामधारी सिंह दिनकर जी की यह कविता – वैराग्य छोड़ बाँहों की विभा…
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तज़्किरा है ख़्वाबों का!
अपनी अपनी ताबीरें ढूँढता है हर चेहरा,चेहरा चेहरा पढ़ लीजे तज़्किरा है ख़्वाबों का| कृष्ण बिहारी नूर