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अस्ताचल की वीणा!
आज मैं हिंदी के एक श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय रामनरेश त्रिपाठी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रामनरेश त्रिपाठी जी की यह कविता – बाजे अस्तोदय की वीणा–क्षण-क्षण गगनांगण में रे।हुआ प्रभात छिप गए तारे,संध्या हुई भानु भी हारे,यह उत्थान…
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ख़ुशबुओं का डेरा है!
ठहरे ठहरे पानी में गीत सरसराते हैं,भीगे भीगे झोंकों में ख़ुशबुओं का डेरा है| साहिर लुधियानवी
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दोनों वक़्त मिलते हैं !
दोनों वक़्त मिलते हैं दो दिलों की सूरत से,आसमाँ ने ख़ुश हो कर रंग सा बिखेरा है| साहिर लुधियानवी
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चम्पई अंधेरा है!
पर्बतों के पेड़ों पर शाम का बसेरा है,सुरमई उजाला है चम्पई अंधेरा है| साहिर लुधियानवी
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छाता बना के रक्खा है!
कोई बता दे ये सूरज को जा के हम ने भी,शजर को धूप में छाता बना के रक्खा है| मुनव्वर राना
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निशाना बना के रक्खा!
मैं बच गया तो यक़ीनन ये मो’जिज़ा होगा,सभी ने मुझ को निशाना बना के रक्खा है| मुनव्वर राना
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हीरा बना के रक्खा है!
तमाम उम्र का हासिल है ये हुनर मेरा,कि मैं ने शीशे को हीरा बना के रक्खा है| मुनव्वर राना
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यहाँ पे कोई बचाने!
यहाँ पे कोई बचाने तुम्हें न आएगा,समुंदरों ने जज़ीरा बना के रक्खा है| मुनव्वर राना
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लालटेन!
आज मैं हिंदी के एक श्रेष्ठ कवि श्री राजा खुगशाल जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। खुगशाल जी की रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री राजा खुगशाल जी की यह कविता – अंधेरी रातों मेंइसके उजाले मेंपहाड़े रटते थे हमबैलों के रस्से बटते थे– डूंगर काकाइसके उजाले…