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आँखों की बंजर धरती
ख़्वाब देखने की हसरत में तन्हाई मेरी, आँखों की बंजर धरती में नींदें बोती है| शहरयार
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यादों के सैलाब में!
यादों के सैलाब में जिस दम मैं घिर जाता हूँ, दिल-दीवार उधर जाने की ख़्वाहिश होती है| शहरयार
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जागता हूँ मैं एक!
जागता हूँ मैं एक अकेला दुनिया सोती है, कितनी वहशत हिज्र की लम्बी रात में होती है| शहरयार
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हवा के रुख़ बदलने से
कोई नहीं है जो बतलाए मेरे लोगों को, हवा के रुख़ के बदलने से क्या ग़ज़ब होगा| शहरयार
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अभिवादन- रवींद्रनाथ ठाकुर
आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट| आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद…
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दोस्त यूँ तो सब होगा!
जहाँ में होने को ऐ दोस्त यूँ तो सब होगा, तिरे लबों पे मिरे लब हों ऐसा कब होगा| शहरयार
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जीवन से ले गया वो!
अब क्या है अर्थ-हीन सी पुस्तक है ज़िंदगी, जीवन से ले गया वो कई दिन निकाल के| कृष्ण बिहारी नूर