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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 10th Jul 2024

    आँखों की बंजर धरती

    ख़्वाब देखने की हसरत में तन्हाई मेरी, आँखों की बंजर धरती में नींदें बोती है| शहरयार

  • 10th Jul 2024

    यादों के सैलाब में!

    यादों के सैलाब में जिस दम मैं घिर जाता हूँ, दिल-दीवार उधर जाने की ख़्वाहिश होती है| शहरयार

  • 10th Jul 2024

    जागता हूँ मैं एक!

    जागता हूँ मैं एक अकेला दुनिया सोती है, कितनी वहशत हिज्र की लम्बी रात में होती है| शहरयार

  • 10th Jul 2024

    हवा के रुख़ बदलने से

    कोई नहीं है जो बतलाए मेरे लोगों को, हवा के रुख़ के बदलने से क्या ग़ज़ब होगा| शहरयार

  • 10th Jul 2024

    इसी उमीद पे कब से

    इसी उमीद पे कब से धड़क रहा है दिल, तिरे हुज़ूर किसी रोज़ ये तलब होगा| शहरयार

  • 10th Jul 2024

    अभिवादन- रवींद्रनाथ ठाकुर

    आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट| आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद…

  • 9th Jul 2024

    दोस्त यूँ तो सब होगा!

    जहाँ में होने को ऐ दोस्त यूँ तो सब होगा, तिरे लबों पे मिरे लब हों ऐसा कब होगा| शहरयार

  • 9th Jul 2024

    अफ़्साने से लिखे हैं!

    ये ताज ये अजंता एलोरा के शाहकार, अफ़्साने से लिखे हैं उरूज-ओ-ज़वाल के|    कृष्ण बिहारी नूर

  • 9th Jul 2024

    बच्चा खेलाए जैसे!

    यूँ ज़िंदगी से कटता रहा जुड़ता भी रहा, बच्चा खेलाए जैसे कोई माँ उछाल के| कृष्ण बिहारी नूर

  • 9th Jul 2024

    जीवन से ले गया वो!

    अब क्या है अर्थ-हीन सी पुस्तक है ज़िंदगी, जीवन से ले गया वो कई दिन निकाल के| कृष्ण बिहारी नूर

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