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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 8th Jan 2025

    रास्ते बन्द हैं सब!

    काम अब कोई न आयेगा बस इक दिल के सिवा,रास्ते बन्द हैं सब कूचा-ए-क़ातिल के सिवा। अली सरदार जाफ़री

  • 8th Jan 2025

    मैं पुकारता रहा हूँ!

    कोई बोलता नहीं है मैं पुकारता रहा हूँ,कभी बुतकदे में बुत को कभी काबे में ख़ुदा को। अली सरदार जाफ़री

  • 8th Jan 2025

    कहीं रह गई है शायद!

    कहीं रह गई है शायद तेरे दिल की धड़कनों में,कभी सुन सके तो सुन ले मेरी ख़ूँशिदा नवा को। अली सरदार जाफ़री

  • 8th Jan 2025

    चश्म-ए-बेवफ़ा को!

    तुझे किस नज़र से देखे ये निगाह-ए-दर्दआगीं,जो दुआयें दे रही है तेरी चश्म-ए-बेवफ़ा को। अली सरदार जाफ़री

  • 8th Jan 2025

    परस्पर!

    आज मैं हिंदी के एक श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय विष्णु खरे जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। इनकी रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं।                            लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय विष्णु खरे जी की यह कविता  – साथ का आख़िर यह भी कैसा मकामकि आलिंगन और चुम्बन तक से अटपटा लगने लगेऐसे और बाक़ी…

  • 7th Jan 2025

    तेरी शोख़ी-ए-हिना!

    अभी और तेज़ कर ले सर-ए-ख़न्जर-ए-अदा को,मेरे ख़ूँ की है ज़रूरत तेरी शोख़ी-ए-हिना को। अली सरदार जाफ़री

  • 7th Jan 2025

    फूल से खिल गये!

    फूल से खिल गये तसव्वुर में,दामन-ए-शौक़ भर गया कोई। अली सरदार जाफ़री

  • 7th Jan 2025

    दिल को छूकर!

    गर्दिश-ए-ख़ूं रगों में तेज़ हुई,दिल को छूकर गुज़र गया कोई। अली सरदार जाफ़री

  • 7th Jan 2025

    बिखर गया कोई!

    सिर्फ़ लहरा के रह गया आँचल,रंग बन कर बिखर गया कोई। अली सरदार जाफ़री

  • 7th Jan 2025

    मियाँ ये क़र्ज़-दारी!

    जहाँ तक हो सके ‘आलम किसी से क़र्ज़ मत लेना,मियाँ ये क़र्ज़-दारी ख़ैर-ओ-बरकत छीन लेती है| आलम निज़ामी

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