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जाना भी नहीं चाहता!
जब से जाना है कि मैं जान समझता हूँ उसे,वो हिरन छोड़ के जाना भी नहीं चाहता है| इरफ़ान सिद्दीक़ी
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उस को मंज़ूर नहीं है!
उस को मंज़ूर नहीं है मिरी गुमराही भी,और मुझे राह पे लाना भी नहीं चाहता है| इरफ़ान सिद्दीक़ी
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वो मगर ख़ुद को!
शोला-ए-इश्क़ बुझाना भी नहीं चाहता है,वो मगर ख़ुद को जलाना भी नहीं चाहता है| इरफ़ान सिद्दीक़ी
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कश्तियाँ डुबोते रहे!
ज़मीं की तरह समुंदर भी था सफ़र के लिए,मगर ये क्या कि यहाँ कश्तियाँ डुबोते रहे| शमीम हनफ़ी
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ख़ुद को खोते रहे!
बस अपने-आप को पाने की जुस्तुजू थी कि हम,ख़राब होते रहे और ख़ुद को खोते रहे| शमीम हनफ़ी
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सूइयाँ चुभोते रहे|!
हमी को शौक़ था दुनिया के देखने का बहुत,हम अपनी आँखों में ख़ुद सूइयाँ चुभोते रहे| शमीम हनफ़ी
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एक छलावा!
आज मैं हिंदी के एक श्रेष्ठ उपन्यासकार और कवि स्वर्गीय विष्णु प्रभाकर जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। इनकी रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री स्वर्गीय विष्णु प्रभाकर जी की, बापू पर लिखी यह कविता – बापू !तुम मानव तो नहीं थेएक छलावा थेकर दिया था तुमने…