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कभी जीना कभी!
न रास आएगी जीने की अदा शायद कभी हम को,कभी जीना कभी जीने के ढब अच्छे नहीं लगते| शमीम हनफ़ी
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मगर कुछ लोग यूँ ही!
ये कह देना कि उन से कुछ गिला-शिकवा नहीं हम को,मगर कुछ लोग यूँ ही बे-सबब अच्छे नहीं लगते| शमीम हनफ़ी
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कभी अपनी गली के!
तो ये होता है हम घर से निकलना छोड़ देते हैं,कभी अपनी गली के लोग जब अच्छे नहीं लगते|
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उजाले में हमें सूरज!
उजाले में हमें सूरज बहुत अच्छा नहीं लगता,सितारे भी सर-ए-दामान-ए-शब अच्छे नहीं लगते| शमीम हनफ़ी
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लक़ड़हारे तुम्हारे खेल!
लक़ड़हारे तुम्हारे खेल अब अच्छे नहीं लगते,हमें तो ये तमाशे सब के सब अच्छे नहीं लगते| शमीम हनफ़ी
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फालतू चीज़!
आज मैं हिंदी के एक श्रेष्ठ कवि श्री विष्णु नागर जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। इनकी अधिक रचनाएं मैंने पहले शेयर नहींकी हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री विष्णु नागर जी की यह कविता – घर में कोई चीज़फालतू नहीं थीटूटा कंघा लगता थाअमर हैभरोसा था अब खोएगा भी नहीं घड़ी बंद…
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कोई नग़्मा ही नहीं!
जाने किस रंग से आई है गुलशन में बहार,कोई नग़्मा ही नहीं शोर-ए-सिलासिल के सिवा। अली सरदार जाफ़री
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बेगुनाह कौन है!
तेग़ मुंसिफ़ हो जहाँ दार-ओ-रसन हों शाहिद,बेगुनाह कौन है उस शहर में क़ातिल के सिवा। अली सरदार जाफ़री
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लेकिन इक शोख़ के!
हम ने दुनिया की हर इक शै से उठाया दिल को,लेकिन इक शोख़ के हंगामा-ए-महफ़िल के सिवा। अली सरदार जाफ़री
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हमसफ़र कोई नहीं!
बाइस-ए-रश्क़ है तन्हारवी-ए-रहरौ-ए-शौक़,हमसफ़र कोई नहीं दूरी-ए-मंजिल के सिवा। अली सरदार जाफ़री