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आँखों को ख़ूँ-बार किया!
क़तरा क़तरा सिर्फ़ हुआ है इश्क़ में अपने दिल का लहू, शक्ल दिखाई तब उस ने जब आँखों को ख़ूँ-बार किया| जाँ निसार अख़्तर
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किसने बीमार किया!
जाते जाते कोई हम से अच्छे रहना कह तो गया, पूछे लेकिन पूछने वाले किस ने ये बीमार किया| जाँ निसार अख़्तर
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तेरी सोई आँखों ने!
पहले भी ख़ुश-चश्मों में हम चौकन्ना से रहते थे, तेरी सोई आँखों ने तो और हमें होशियार किया| जाँ निसार अख़्तर
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श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ की रचनायें-22
कल तक मैं अपनी पुरानी कुछ कविताएं शेयर कर रहा था, परंतु आज जो गीत शेयर कर रहा हूँ, वह उतना पुराना नहीं, हाल ही का है| एक पुरानी घटना याद आ रही है, मैं उस समय अपने संस्थान के लिए कवि-सम्मेलन आयोजित करता था| उस समय मंच के एक कवि थे- निर्भय हाथरसी, वे…
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जितने भी बदनाम हुए!
मुद्दत हुई उस जान-ए-हया ने हम से ये इक़रार किया, जितने भी बदनाम हुए हम उतना उस ने प्यार किया| जाँ निसार अख़्तर
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कोई सूरज मिरे!
लम्हा लम्हा रहे आँखों में अँधेरे लेकिन, कोई सूरज मिरे सीने में उभरता ही रहा| जाँ निसार अख़्तर
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मिट गया पर तिरी!
मिट गया पर तिरी बाँहों ने समेटा न मुझे, शहर दर शहर मैं गलियों में बिखरता ही रहा| जाँ निसार अख़्तर
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कोई साया मिरे!
रास्ते भर कोई आहट थी कि आती ही रही, कोई साया मिरे बाज़ू से गुज़रता ही रहा| जाँ निसार अख़्तर
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चाँद उतरता ही रहा!
रौशनी कम न हुई वक़्त के तूफ़ानों में, दिल के दरिया में कोई चाँद उतरता ही रहा| जाँ निसार अख़्तर
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कोई सँवरता ही रहा!
दीदा ओ दिल में कोई हुस्न बिखरता ही रहा, लाख पर्दों में छुपा कोई सँवरता ही रहा| जाँ निसार अख़्तर