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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 29th Jan 2025

    ये जो फैला हुआ!

    ये जो फैला हुआ ज़माना है,इस का रक़्बा ग़रीब-ख़ाना है| निदा फ़ाज़ली

  • 29th Jan 2025

    मिट्टी में मिली मिट्टी!

    हर एक सिकन्दर का अन्जाम यही देखा,मिट्टी में मिली मिट्टी, पानी में मिला पानी। सूर्यभानु गुप्त

  • 29th Jan 2025

    रातों का तसव्वुर है!

    आज मैं विख्यात शायर स्वर्गीय साग़र निज़ामी जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ। साग़र निज़ामी जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री स्वर्गीय साग़र निज़ामी जी की यह ग़ज़ल – रातों का तसव्वुर है उनका और चुपके-चुपके रोना है ।ऐ सुब्‍ह के तारे तू ही…

  • 28th Jan 2025

    काँधों पे रहा चेहरा!

    जन्नत थी मगर हमको झुक कर न उठानी थी,काँधों पे रहा चेहरा, चेहरे पे रहा पानी। सूर्यभानु गुप्त

  • 28th Jan 2025

    इक मोम के चोले में!

    इक मोम के चोले में धागे का सफ़र दुनिया,अपने ही गले लग कर रोने की सज़ा पानी। सूर्यभानु गुप्त

  • 28th Jan 2025

    तारीख़ बना पानी!

    इस दुनिया में रहकर भी दुनिया में नहीं रहना,जिस दिन ये हुनर आया, तारीख़ बना पानी। सूर्यभानु गुप्त

  • 28th Jan 2025

    घर छोड़के निकलें तो!

    घर छोड़के निकलें तो संसार के काम आएँ,कब धूप को पहने बिन बनता है घटा पानी। सूर्यभानु गुप्त

  • 28th Jan 2025

    य़ूँ जम के गिरा पानी!

    अँगनाई से तन-मन तक कुछ भी न बचा कोरा,इस बार के सावन में य़ूँ जम के गिरा पानी। सूर्यभानु गुप्त

  • 28th Jan 2025

    दो शख़्स मिले ऐसे!

    दस्तक दी दरे-दिल पर बरसात के मौसम ने,दो शख़्स मिले ऐसे जैसे कि हवा-पानी। सूर्यभानु गुप्त

  • 28th Jan 2025

    हमने तो लिखा बादल!

    हर लफ़्ज़ का मानी से रिश्ता है बहुत गहरा,हमने तो लिखा बादल और उसने पढ़ा पानी। सूर्यभानु गुप्त

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