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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 31st Jan 2025

    रातें गुज़ारने वाला!

    भरे मकाँ का भी अपना नशा है क्या जाने,शराब-ख़ाने में रातें गुज़ारने वाला| वसीम बरेलवी

  • 31st Jan 2025

    न कोई जीतने वाला!

    बस एक प्यार की बाज़ी है बे-ग़रज़ बाज़ी,न कोई जीतने वाला न कोई हारने वाला| वसीम बरेलवी

  • 31st Jan 2025

    हमारी जान गई!

    हमारी जान गई जाए देखना ये है,कहीं नज़र में न आ जाए मारने वाला| वसीम बरेलवी

  • 31st Jan 2025

    सांसें !

    आज मैं श्रेष्ठ राजस्थानी और हिंदी भाषा के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय हरीश भादानी जी का एक गीत  शेयर कर रहा हूँ। भादानी जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।                  लीजिए आज प्रस्तुत है श्री स्वर्गीय हरीश भादानी जी का यह गीत – शहरीले जंगल में सांसें          हलचल रचती जाएंकफ़न ओस का फाड़ बीच…

  • 30th Jan 2025

    नश्शा उतारने वाला!

    मिरी वफ़ाओं का नश्शा उतारने वाला,कहाँ गया मुझे हँस हँस के हारने वाला| वसीम बरेलवी

  • 30th Jan 2025

    बूढ़ा है मगर पेड़!

    हर साल नए पत्ते बदल देते हैं तेवर,बूढ़ा है मगर पेड़ पुराना नहीं लगता| वसीम बरेलवी

  • 30th Jan 2025

    प्यासे को कोई दूसरा!

    ख़ुद-ग़र्ज़ बना देती है शिद्दत की तलब भी,प्यासे को कोई दूसरा प्यासा नहीं लगता| वसीम बरेलवी

  • 30th Jan 2025

    सीने से लिपटते ही!

    सीने से लिपटते ही पलट जाने पे ख़ुश हैं,लहरों को किनारों पे भरोसा नहीं लगता| वसीम बरेलवी

  • 30th Jan 2025

    इस शहर में क्या है!

    तुम साथ नहीं हो तो कुछ अच्छा नहीं लगता, इस शहर में क्या है जो अधूरा नहीं लगता| वसीम बरेलवी

  • 30th Jan 2025

    उतनी ही हर नदी है!

    छोटा बड़ा है पानी ख़ुद अपने हिसाब से,उतनी ही हर नदी है यहाँ जितनी प्यास है| निदा फ़ाज़ली

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