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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 3rd Feb 2025

    इश्क़ कुछ रोग नहीं!

    कितना मानूस सा हमदर्दों का ये दर्द रहा,इश्क़ कुछ रोग नहीं था जो दवाई लेते| राहत इंदौरी

  • 3rd Feb 2025

    एक बार फिर शारजाह!

    दुबई में यह दूसरा सप्ताहांत, था। इस बार हम लोग दुबई के अल फुरज़ान इलाके से कार द्वारा शारजाह गए, जबकि 9 वर्ष पूर्व जब हम आए थे, तब हम शारजाह में ही रहे थे। उस बार मैं लगभग हर दिन कॉर्निश अथवा वाटर फ्रंट तक जाता था, जो इस बीच और ज्यादा सुंदर और…

  • 2nd Feb 2025

    बर्फ़ की तरह दिसम्बर

    बर्फ़ की तरह दिसम्बर का सफ़र होता है, हम उसे साथ न लेते तो रज़ाई लेते| राहत इंदौरी

  • 2nd Feb 2025

    लोग क्यूँ आग!

    आबले अपने ही अँगारों के ताज़ा हैं अभी,लोग क्यूँ आग हथेली पे पराई लेते| राहत इंदौरी

  • 2nd Feb 2025

    एक सच के लिए!

    बैर दुनिया से क़बीले से लड़ाई लेते,एक सच के लिए किस किस से बुराई लेते| राहत इंदौरी

  • 2nd Feb 2025

    मोती के दाने हो गए!

    पलकों पर ये आँसू प्यार की तौहीन थे,आँखों से गिरे मोती के दाने हो गए| बशीर बद्र

  • 2nd Feb 2025

    अब उसे देखे हुए!

    ये भी मुमकिन है कि मैं ने उस को पहचाना न हो,अब उसे देखे हुए कितने ज़माने हो गए| बशीर बद्र

  • 2nd Feb 2025

    आईने फेंक दो!

    जाओ उन कमरों के आईने उठा कर फेंक दो,बे-अदब ये कह रहे हैं हम पुराने हो गए| बशीर बद्र

  • 2nd Feb 2025

    दूसरा दर्जा!

    आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि श्री हेमंत शेष जी का एक कविता शेयर कर रहा हूँ। इनकी रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं।                            लीजिए आज प्रस्तुत है श्री श्री हेमंत शेष जी की यह कविता – दोपहर का वक़्त था वहपर ठीक दोपहर जैसा नहीं,नदी जैसी कोई चीज़ भागती हुई खिड़की से बाहरसूख रही…

  • 1st Feb 2025

    परिंदों के ठिकाने!

    क्यूँ हवेली के उजड़ने का मुझे अफ़्सोस हो,सैकड़ों बे-घर परिंदों के ठिकाने हो गए| बशीर बद्र

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