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इश्क़ कुछ रोग नहीं!
कितना मानूस सा हमदर्दों का ये दर्द रहा,इश्क़ कुछ रोग नहीं था जो दवाई लेते| राहत इंदौरी
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एक बार फिर शारजाह!
दुबई में यह दूसरा सप्ताहांत, था। इस बार हम लोग दुबई के अल फुरज़ान इलाके से कार द्वारा शारजाह गए, जबकि 9 वर्ष पूर्व जब हम आए थे, तब हम शारजाह में ही रहे थे। उस बार मैं लगभग हर दिन कॉर्निश अथवा वाटर फ्रंट तक जाता था, जो इस बीच और ज्यादा सुंदर और…
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बर्फ़ की तरह दिसम्बर
बर्फ़ की तरह दिसम्बर का सफ़र होता है, हम उसे साथ न लेते तो रज़ाई लेते| राहत इंदौरी
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अब उसे देखे हुए!
ये भी मुमकिन है कि मैं ने उस को पहचाना न हो,अब उसे देखे हुए कितने ज़माने हो गए| बशीर बद्र
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दूसरा दर्जा!
आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि श्री हेमंत शेष जी का एक कविता शेयर कर रहा हूँ। इनकी रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री श्री हेमंत शेष जी की यह कविता – दोपहर का वक़्त था वहपर ठीक दोपहर जैसा नहीं,नदी जैसी कोई चीज़ भागती हुई खिड़की से बाहरसूख रही…
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परिंदों के ठिकाने!
क्यूँ हवेली के उजड़ने का मुझे अफ़्सोस हो,सैकड़ों बे-घर परिंदों के ठिकाने हो गए| बशीर बद्र